लखनऊ। विश्व स्तर पर पोलियो, दिमागी बुखार और डेंगू जैसे बीमारी पर शोध कर अपनी पहचान बना चुके वायरोलॉजी के एक्सपर्ट पीजीआई के पूर्व माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डी एन ढोल की मौत पूर्णा संक्रमण से हो गई। प्रोफेसर ढोल खुद कोरोनावायरस पर शोध कर रहे थे और उनका मानना था कि वायरस सितंबर अक्टूबर में एक बार और तेजी पकड़ेगा। प्रोफेसर ढोल की मौत पर देशभर के माइक्रो बायोलॉजिस्ट प्रोफेसरों और अन्य डॉक्टरों ने दुख व्यक्त किया है। प्रोफेसर ढोल को 4 सितंबर को कोरोना संक्रमण की पुष्टि होने पर पीजीआई के कोविड-19 हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। उसके बाद उनकी तबीयत तेजी से बिगड़ती चली गई और वह वेंटिलेटर पर स्विफ्ट कर दिए गए। कुछ दिन से उनकी हालत स्थिर बनी हुई थी लेकिन बीती रात उनकी तबीयत तेजी से बिगड़ी और कोरोनावायरस से वह जंग हार गए। उनकी इस मौत पर चिकित्सा जगत में शोक छा गया है। अगर देखा जाए तो जिस वक्त देश में पोलियो का प्रकोप चरम पर था खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में उस वक्त प्रोफेसर ढोल के शोध ने पोलियो को नियंत्रण कर समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बाद पूर्वांचल में बच्चों के लिए आतंक बना दिमागी बुखार पर उनके महत्वपूर्ण शोध और सुझाव ने नियंत्रण पाने में योगदान कोई नहीं भूल सकता। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की वरिष्ठ डॉ शीतल वर्मा ने प्रोफेसर ढोल की मौत पर दुख प्रकट करते हुए बताया प्रोफेसर ढोल सर की खोज और नए-नए वायरस पर उनकी जानकारी हम लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत.












