जल्द ही हार्ट बाईपास सर्जरी नहीं करानी होगी, नयी तकनीक नेचुरल बाईपास से आपका हार्ट ठीक से करेगा वर्क

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लखनऊ। डॉ. राममनोहर लोहिया संस्थान की डॉ. ज्योत्सना अग्रवाल ने बताया कि एचआईवी, मलेरिया आदि की कोई बेहतर वैक्सीन नहीं है। फेफड़ की टीबी होने पर भी हमारे पास बेहतर विकल्प नहीं हैं। अब हो रहे शोध से नई उम्मीदें जगी हैं। जल्द ही इन बीमारियों पर भी नई वैक्सीन आने वाली हैं। यह जानकारी डॉ. राममनोहर लोहिया संस्थान की डॉ. ज्योत्सना अग्रवाल ने कलाम सेंटर में इंडिया इंटरनेशन साइंस फेस्टिवल में बायोकेमिस्ट्री विभाग के सहयोग से आयोजित हेल्थ कांक्लेव में जनजागरण कार्यक्रम के दूसरे दिन दी। कार्यक्रम में नीदरलैंड से आए इंडियन एकेडमी ऑफ बायोमेडिकल साइंसेज के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. हरि शंकर शर्मा ने बताया कि जल्द ही हार्ट बाईपास सर्जरी नहीं करवानी पड़ेगी। नयी तकनीक नेचुरल बाईपास से आपका हार्ट ठीक से काम करना शुरू कर देगा। रिकॉम्बीनेंट प्रोटीन मॉलीक्यूल्स, स्टेम सेल और ग्रोथ फैक्टर की मदद से यह काम आसानी से हो जाएगा।

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उन्होंने बताया कि यह प्रयोग चूहों व जानवरों पर पूरी तरह सफल पाया गया है और जल्द ही मनुष्य में इसकी टेसिं्टग कर इसे शुरू किया जाएगा। कार्यक्रम में संस्थान की विशेषज्ञ डा. अग्रवाल ने कहा कि नयी वैक्सीन आ जाने से इन गंभीर बीमारियों के इलाज में आसानी होंगी। उन्होंने कहा कि हमें खुद जागरूक रहकर इन बीमारियों से बचना होगा। डा. अग्रवाल ने बताया कि मलेरिया व टीबी आदि बीमारी में अगर लक्षण मिलने पर विशेषज्ञ डाक्टर के निर्देशन में इलाज शुरू किया जाए किसी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।

केजीएमयू की डॉ. सुजात देव ने बताया कि अगर देखा जाए तो बांझपन की समस्या ज्यादा बढ़ रही है। यह तनाव और देर से बच्चे की प्लानिंग करने के कारण ज्यादा देखने को मिल रही है। इसके अलावा हमारा खानपान और बिगड़ती जीवनशैली भी कहीं न कहीं इसका प्रमुख कारण है।  डॉ. सुजाता देव ने कहा कि अगर शादी हो जाती है तो तीस साल की उम्र तक एक बच्चे की प्लानिंग जरूर कर लेनी चाहिए, क्योंकि उम्र के साथ ओवरी के अंडे कम होने लगते हैं। उन्होंने बताया कि वर्क स्ट्रेस भी हार्मोन्स पर असर डालता है, इसको दूर करना चाहिए।

एरा मेडिकल कॉलेज के कुलपति प्रो. अब्बास अली मेंहदी ने बताया कि हर्बल दवाओं, कॉस्मेटिक, लोशन, काजल आदि का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा हैं। इनमें लेड का मात्रा होती है, जिसके कारण हीमोग्लोबिन कम हो जाता है। इससे एनीमिया का खतरा के साथ ही कैंसर की आशंका कई गुना बढ़ जाती हैं।

वल्लभ भाई पटेल चेस्ट इंस्टिट्यूट के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि रैपिड गाइडलाइन से टीबी को समाप्त करने में काफी आसानी होगी। उन्होंने बताया कि शोध के बाद जल्द ही टीबी के लिए भी इंजेक्शन आने वाले हैं, जिससे मरीजों को राहत मिलेगी।

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