लखनऊ। क्रिटकल केयर में अल्ट्रासाउंड की भूमिका खास कर फेफड़े की जांच में महत्वपूर्ण होती जा रही है। स्टेथोस्कोप से फेफड़ों की हलचल को ध्यान से सुनना व महसूस करना होता है लेकिन अल्ट्रासाउंड से आंतरिक स्थिति स्पष्ट हो जाती है। बढते प्रदूषण व अन्य कारणों से लोगों में फेफड़े की बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही है। यह जानकारी नवें रेस्पटरी, क्रिटकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन अपडेट 2017 में क्रिटकल केयर विशेषज्ञ डा. बीपी सिंह ने दी।
कार्यशाला में चंढीगढ़ के डा. एस के जुंदल ने बताया कि फ ंगस डिजीज फेफड़े पर ही नही असर दिखाते है बल्कि डायबिटीज मरीज को भी प्रभावित करते है। अगर डायबिटीज नियंत्रित नहीं है तो फंगस इंफेक्शन का खतरा बढ जाता है। दी। सूर्या चेस्ट फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में डा. दीपक अग्रवाल सहित अन्य विशेषज्ञों ने क्रिटिकल केयर से जुड़ी जानकारी दी। कार्यशाला का उद्घाटन डा. एस के कटियार ने किया।
कैडिडा व ट्रिपोकॉकस नामक बैक्टीरियल संक्रमण के मरीज भी ज्यादा देखने को मिले है –
डा. जुंदल ने कहा कि वैसे तो आज कल फेफड़ों में बैक्टीरियल व फंगस संक्रमण बढ़ रहा है। यह सबसे ज्यादा आईसीयू में भर्ती व अंग प्रत्यारोपण किये गये मरीज को जल्दी चपेट में लेता है। डायबिटीज के मरीज को भी फंगस संक्रमण होने की ज्यादा आशंका तब हो जाती है जब उसका डायबिटीज लगातार अनियत्रिंत रहता है। उन्होंने बताया कि आमतौर पर यूट्रोफिल फंगस इम्यून सिस्टम ठीक न होने पर तेजी से गिरफ्त में लेता है लेकिन अब कैडिडा व ट्रिपोकॉकस नामक बैक्टीरियल संक्रमण के मरीज भी ज्यादा देखने को मिले है। डा.दीपक अग्रवाल ने कहा कि फेफड़े के साथ लिवर के बीमारियों की चपेट में लोग ज्यादा आ रहे है।
उन्होंने बताया कि क्रिटकल केयर एक आवश्यक सिस्टम होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि अस्पतालों में क्रिटकल केयर सिस्टम का सेटअप होना आवश्यक हो गया है लेकिन मानकों के अनुसार यह होना चांिहए। मेंदाता दि मेडिसिटी गुड़गांव के डा. श्रीकांत श्री निवासन ने बताया कि अल्ट्रासोनोग्राफी कार्डियक सिस्टम व अन्य महत्वपूर्ण अंगों की जांच करने में बेहद कारगर है। ऐसे में यह क्रिटिकल केयर की तीसरी आंख माना जा रहा है।












