अरे ..नवाबों का शहर बदल सा गया है

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किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में शनिवार का दिन कुछ खास था। पहले आप- पहले आप लखनऊ तहजीब में एक दूसरे का सम्मान करते हुए कोई भी जार्जियन मंच के सीट पर नहीं बैठा। गोल्डन जुबली ईयर बना रहे वर्ष 1967 बैच के जार्जियन्स ने ब्रााऊन हाल में संस्मरण सुनाते हुए यादे ताजा की। किसी रैगिंग की बात बतायी तो किसी ने अपने गुरु जी से मिली सजा में सीख की जानकारी दी। इतने सालों में केजीएमयू के साथ नवाबों का शहर लखनऊ कितना बदल चुका है। जार्जियन्स ने एनॉटामी में रुद्राश का पेड़ को रोपण करके गोल्डन ईयर की यादगार बनाया।

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कुलपति प्रो. एम एलबी भट्ट ने कहा कि सभी हमारे वरिष्ठ जार्जियन है, जिन्होंने देश- विदेश में केजीएमयू का नाम पताका फैलायी है। कार्यक्रम में पुरानी यादों का जिक्र करते जार्जियन डॉ. एम एन कपूर ने कहा कि केजीएमयू उस कालेज हुआ करता था। यहां पर एक ही गल्र्स हास्टल विजय लक्ष्मी था। जहां पर हमारी महिला साथ रहा करती थी। पढ़ाई के बाद तो गल्र्स हास्टल की तरफ जाना बड़ा ही मुश्कि ल था। इस लिए हास्टल हम लोगों के लिए किसी तीर्थस्थल से कम नहीं माना जाता था। हम अक्सर उधर जाने की कोशिश किया करते थे। ऐसे में स्थिति जो भी साथी महिला छात्रावास की दीवार छूकर कर आता था आैर हमारे लिए किसी स्टार से कम नहीं होता था।

वर्ष 1967 बैच डा. राजी अय्यर को पहला हीवेट मेडल मिला था। वह बताती है कि वर्ष 1972 में हीवेट के साथ 13 मेडल का सम्मान मिला था। यह उनके लिए सबसे खास लम्हा था, जब उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति वी वी गिरी ने सम्मानित किया था। डा. राजी बताती हैं कि कॉलेज के दिनों में वह सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान रखती थीं। इस वक्त अमेरिका में अपनी सेवाएं देने के बाद के बाद अब चेन्नई में क्लीनिक में आती जाती रहती है। डा,. राजी ने बताया कि अब हजरतगंज बदल गया है। मेफेयर व बसंत सिनेमा हाल की रौनक, हलवासिया बाजार की चहल अब वह नही है। हां खादी आश्रम व बजरंग बली का मंदिर वही है। देखकर बहुत अच्छा लगा।

कार्यक्रम में डॉ. एस सी टंडन ने बताया कि वर्ष 1967 में रैगिगं होती थी लेकिन उस रैगिंग एक परिचय हुआ करता था। उसे सजा के रुप में नहीं बल्कि हम लोग मजा के रुप में लिया करते थे। उन्होंने बताया रैगिंग के नाम पर अक्सर मुर्गा बनाया जाता था। उस वक्त तेरह नम्बर बहुत चर्चित था। बाद में वही सीनियर एक बड़े भाई की तरह हर प्रकार की मदद किया करते थे। डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि केजीएमयू में उस पहली बार किडनी प्रत्यारोपण किया गया था। यह वर्ष 1967 बैच के जार्जियन के लिए सबसे ऐतिहासिक पल था, जब वर्ष 1970 में केजीएमयू में पहला किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था, उस समय डॉ. शाही एक बड़ा नाम हुआ करते थे।

उन्होंने ही यह प्रत्यारोपण सफलता पूर्वक किया था। वर्ष 1967 बैच के ही मेरठ निवासी दिवंगत हो चुके डॉ. एम के सिंह के नाम पर केजीएमयू में रिसर्च फेलोशिप शुरू हो सकती है। इसके लिए डॉ. एम के सिंह के परिवार की ओर से कवायद की जा रही है। अमेरिका में रह रहीं उनकी पत्नी आशा सिंह, पुत्री हिमानी सिंह और पुत्र अरुण सिंह इसकी कोशिश कर रहे है। वह लोग इससे पूर्व छात्र मिलन समारोह में शिरकत करने आए थे। इस दौरान डॉ, एम के सिंह से जुड़ी यादों को यादकर उनके साथी भी ताजा करके बेहद दुखी थे।

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