लखनऊ। ऑस्टियो आर्थराइटिस को अब जरूरी नहीं कि मरीज को सर्जरी ही कराना पड़े। वह मात्र एक इंजेक्शन लगाने मात्र से ही ठीक हो सकता है। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन में पीआरपी इंजेक्शन की थेरेपी का प्रयोग मरीजों पर सफलता पूर्वक किया जा रहा है। इसकी खास बात यह है कि मरीज के अपने ब्लड से ही उसकी बीमारी का सटीक इलाज किंया जा रहा है।
विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार गुप्ता ने बताया कि इसे प्लेटलेट्स-रिच प्लाज्मा थैरेपी के नाम से जाना जाता है, इस प्रक्रिया में जिस व्यक्ति का उपचार किया जा रहा है। उसी का ब्लड लिया जाता है। इसमें एक प्रक्रिया के जरिये प्लेटलेट्स के साथ प्लाज्मा ट्यूब में एकत्र कराए जाते हैं। यह प्लाज्मा, जिसमें प्लेटलेट्स और ग्रोथ फैक्टर्स की मात्रा अधिक होती है, ऊतकों के पुनर्निर्माण और क्षतिग्रस्त ऊतकों (टिश्यूज) को ठीक करने में काफी उपयोगी होता है। पीआरपी में सामान्य रक्त की तुलना में 5 गुना अधिक प्लाज्मा होता है।
डॉ. राहुल भरत ने बताया कि इस थैरेपी का आधार यह है कि प्लेटलेट्स घावों के भरने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। एक बार में 30 मिलीलीटर ब्लड लिया जाता है। इससे प्लेटलेट्स को अलग करने के बाद इसमें एक्टिवेटर मिलाए जाते हैं, जो प्लेटलेट्स को एक्टिवेट कर देते हैं, ताकि जहां क्षति हुई है वहां यह बेहतर तरीके से कार्य कर सके। इसको ऐसे भी कहा जा सकता है कि पीआरपी इंजेक्शन से कार्टिलेज को पुर्नजीवित करने का काम करता है। 30 मिलीलीटर ब्लड में करीब 3 से 4 मिली. पीआरपी बनेगा।
सबसे पहले प्रभावित क्षेत्र को सुन्न करने के लिए सामान्य एनेस्थेसिया दिया जाता है, फिर विशेष माइक्रो निडिल की सहायता से पीआरपी को घुटने में प्रवेश कराया जाता है। इससे ब्लड सर्कुलेशन की सक्रियता बढ़ जाती है और इसके स्टेम सेल्स ऊतकों की मरम्मत करते हैं, सूजन कम करते हैं और इस प्रकार ऑस्टियोआर्थराइटिस के लक्षण कम करते हैं। इस संपूर्ण प्रक्रिया में 2-3 घंटे से ज्यादा समय नहीं लगता है और न ही अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ती है। पीआरपी इलाज से दर्द, अकड़ और कार्यप्रणाली में बहुत सुधार आता है। चूंकि यह सिंथेटिक नहीं जैविक इंजेक्शन है, इसलिए मरीजों पर इसका प्रभाव अलग-अलग होता है। कई अध्ययन बताते हैं कि लगभग 73 प्रतिशत मामलों में कई क्लिनिकल और फंक्शनल फायदे देखे गए हैं और एक साल तक ऑर्थराइटिस के लक्षण कम होते है।
उन्होंने बताया कि पीआरपी इंजेक्शन का असर 4-6 हफ्ते बाद ही दिखता है, इसलिए मरीज को इस इंजेक्शन के तत्काल परिणाम की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इंजेक्शन बहुत किफायती है, क्योंकि इस पर होने वाला खर्च नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के खर्च के दसवें हिस्से के बराबर होता है। हालांकि पीआरपी इंजेक्शन लेने के लिए उम्र सीमा की कोई जरूरत नहीं रहती, लेकिन ऑर्थराइटिस के शुरुआती चरण में जितनी जल्दी हो सके यह इलाज कराना ही बेहतर होता है।
उन्होंने बताया कि ऑस्टियो आर्थराइटिस का मरीज यदि चौथे स्टेज में पहुंच गया हो तो वहां पीआरपी इंजेक्शन काम नहीं करेगा, क्योंकि ऐसे मरीजों के घुटने चिपक गए होते हैं। ऐसे में ऑपरेशन कराना ही होगा। किसी भी टेंडन या लिंगामेंट इंजरी का सफलतापूर्वक पीआरपी थैरेपी के द्वारा इलाज हो सकता है, लेकिन पूरी तरह टूट चुके टेंडन या लिगामेंट्स का इसके द्वारा उपचार संभव नहीं है। खिलाड़ियों के लिए भी यह कारगर है, जिनके घुटनों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है।
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