लखनऊ। केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग के कारण पूरी दुनिया में लगभग 50 लाख लोगों की मौत हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि अगर एंटीबायोटिक दवाओं सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जाए तो बैक्टीरिया को मारने की उनकी क्षमता खत्म हो जाती है, इसे रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस-ए.एम.आर.) कहा जाता है।
ke
डॉ. सूर्यकान्त ने कहा कि एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध वह स्थिति है, जब गंभीर संक्रमणों के उपचार में प्रयुक्त एंटीबायोटिक दवाएँ प्रभावी नहीं रह जाती है। उन्होंने बताया कि यह समस्या टीबी, निमोनिया, यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन, त्वचा एवं सॉफ्ट टिशू संक्रमण, सेप्सिस तथा अन्य विभिन्न संक्रामक रोगों के उपचार में एंटीबायोटिक की विफलता के रूप में सामने आती है, जिससे संक्रमण का इलाज करना कठिन हो जाता है और बीमारी फैलने, गंभीर बीमारी और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
डॉ. सूर्यकांत ने कहा कि एएमआर तब होता है जब बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और परजीवी समय के साथ बदलते हैं और उन पर दवाओं का असर नहीं होता है,
उन्होंने कहा कि भारत में एंटीबायोटिक दवाऐं मेडिकल स्टोर पर बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर भी आसानी से मिल जाती हैं, जिससे आम जनता साधारण सर्दी, जुखाम या बुखार में भी इन दवाओं का प्रयोग कर लेती है, यह भी एएमआर का एक प्रमुख कारण है। डा. सूर्यकान्त ने कहा कि इसके लिए एक राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य नीति बनानी पड़ेगी और एंटीबायोटिक प्रबंधन कार्यक्रम विकसित करना पड़ेगा तभी हम इस समस्या का समाधान ढूंढ पायेंगे।












