लखनऊ। बदलते परिवेश में बुढ़ापे में होने वाली बीमारियां पर चालीस वर्ष के आस-पास ही होने लगी है। इनमें पार्किसन बीमारी जो कि बुजुर्गो में ही होती थी। अब लगभग चालीस वर्ष के आस-पास लोगों में भी पार्किसन बीमारी होने लगी है। विशेषज्ञ डाक्टरों का मानना है कि आंकड़ों को देखा जाए तो यह बीमारी देश में प्रत्येक छह मिनट में एक को चपेट में ले रही है। हालांकि विशेषज्ञ का मानना है कि समय पर इसकी पहचान करके इलाज करके निंयंत्रण में किया जा सकता है।
पार्किसन बीमारी 55 वर्ष पार करने के बाद ही लोगों में देखी जाती थी। परिवार में अगर किसी सदस्य को हो तो ऐसे परिवार के अन्य सदस्यों को सर्तक हो जाना चाहिए। विशेषज्ञों की माने तो यह एक न्यूरोडीजेरेटिव डिस आर्डर है। इस डिस आर्डर में देखा जाए तो दिमाग में कुछ प्रकार केमिकल का संतुलन गड़बड़ा जाता है। इसकी शुरु आत मरीज के हाथ में कंपन से होती है। मरीज की लार गिरने लगती है आैर चाल धीमी हो जाती है।
मांसपेशिया सख्त होने के साथ यूरीन करने में भी दिक्कत होने लगती है। इस तरह के मरीजों की सर्जरी भी की जाती है, लेकिन उसका खर्च ज्यादा आता है, लेकिन मरीज लगभग 15 वर्ष तक सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है। लोहिया संस्थान के न्यूरोलॉजिस्ट डा. दिनकर का मानना है कि अगर शुरुआत लक्षण मिलने पर ही इलाज शुरू किया जाए तो किसी हद तक नियंत्रण कि या जा सकता है। नयी दवाएं इस पर कारगर है। वही केजीएमयू के जीरियाटिक मेडिसिन विभाग के प्रमुख डा. कौसर उस्मान का कहना है कि पार्किसन बीमारी को देखा जाए, तो उनकी ओपीडी में लगभग एक सप्ताह में आठ नौ मरीज आ जाते है। इसी प्रकार न्यूरोलॉजी के डा. आर के गर्ग का कहना है कि पार्किसन बीमारी का लक्षण के आधार पर ही पहचान कर विशेषज्ञ डाक्टर के परामर्श पर दवा लेना चाहिए।