लखनऊ। जन्म से अविकसित आहारनली को प्राकृतिक तरीके से चार चरणों में सर्जरी करके जोड़ कर किंग जार्ज चिकित्सा चिकित्सा विश्वविद्यालय के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डा. एस एन कुरील देश के पहले शल्य चिकित्सक बन गये है। डा. कुरील ने नवजात शिशु के अविकसित आहारनली को ऊतक इंजीनियरिंग प्रौद्योगिकी का उपयोग करके एसोफेजेल लांगिथिंग नयी तकनीक विकसित करते हुए आहानली को प्राकृतिक तरीके से जोड़ दिया। अब तक इस प्रकार की सर्जरी जापान के विश्व में 19 सफल मामले मिले है। शिशु में दस हजार में एक में पायी जाने वाली बीमारी एसोफेजियल एट्रेसिया बीमारी से पीड़ित था।
अब वह छह वर्ष का हो गया है आैर सामान्य रूप से भोजन कर रहा है। वरिष्ठ पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. एस एन कुरील ने पत्रकार वार्ता में बताया कि वर्ष 2012 में दिवाकर का जन्म हुआ था। जन्म के बाद शिशु लार व दूध को निगल नही पा रहा था। जिससे उसको जल्द ही स्पिल्जि निमोनिया होने की आशंका थी आैर अगर इलाज शुरू न किया जाता तो उसकी मौत तक हो सकती थी। शिशु में एसोफेजियल एट्रेसिया नामक जन्मजात दिक्कत थी और शिशु का वजन ढाई किलो था। इसमें आहारनली अधूरी रहने के अलावा पेट में गैस नहीं रहती। एक्स-रे के एक्सपोजर के जरिये इस बीमारी का पहचान की जा सकती है। बीमारी के कारण शिशु दूध, लार या कोई भी पदार्थ निगल नहीं पा रहा था। डॉ. कुरील ने बताया कि शिशु में ट्यूब फिडिंग निकल कर आहारनली के उपरी हिस्से को लार को रास्ता देने के लिए त्वचा से बाहर निकाल दिया गया।
डॉ. कुरील ने बताया कि जांच के बाद जन्म के सिफ दो दिन बाद ही दिवाकर की पहली सर्जरी वर्ष 2012 में किमुरा तकनीक से आहारनली के आंतरिक फेशिया परत में फेशियल परत के नीचे बिना मांसपेशियों को नुकसान पहुंचाए आंतरिक एसोफेगस को एक सेंटीमीटर तक बढ़ाया दिया गया। इसके बाद वर्ष 2013, 2015 और 2017 में भी सर्जरी के माध्यम से आहार नली को बढ़ा दिया गया। इन तीनों जटिल सर्जरी के बाद आहारनली अपनी लंबाई को प्राप्त कर चुकी थी। इन वर्षो में चेस्ट के नीचे लगे पाइप के जरिए ही दिवाकर को दूध व तरल आहार दिया गया। डा. कुरील ने बताया कि 6 सितंबर वर्ष 2018 को अंतिम सर्जरी की गई। इसमें थौरेक्स तकनीक से चेस्ट के नीचे से ले जाकर लिवर को बचाते हुए आहारनली को जोड़ दिया गया।
उन्होंने बताया कि कहने में आसान है लेकिन हार्ट आैर चेस्ट के नीचे से आहरनली को लाकर जोड़ना बेहद जटिल काम था। यह आहारनली प्राकृतिक तरीके से खुद को विकसित कर लेगी। डॉ. कुरील ने बताया कि बच्चों ऐसे मामले दस हजार में से एक में पाया जाता है। अभी तक के इस तरह के मामलो में जब शिशु बड़ा होता है तो आहारनली को कोलन का हिस्सा लेकर कृत्रिम आहारनली बना दी जाती है। इसमें प्राकतिक आहारनली नहीं बन पाती है, जिससे समस्याएं बनी रहती है। डॉ. कुरील ने दावा कि अभी तक दुनिया में मात्र 19 ऐसी सफल सर्जरी हुई हैं। देश के केजीएमयू में इस तरह की उनके द्वारा की गयी देश पहली सर्जरी है।
दिवाकर के पिता सुनील तिवारी बताया कि वह पुणे में निजी नौकरी करते हैं और मां स्वाति तिवारी गृहस्थी सम्हालती हैं। उन्होने बताया कि चारों सर्जरी में कुल तीस हजार रूपए ही खर्च हुए हैं। ऐतिहासिक सर्जरी करने वाली टीम में डॉ. एस एन कुरील के साथ डॉ. अर्चिका गुप्ता, डॉ. विपुल बोथरा, डॉ. सुनील कनौजिया, डॉ. अखिलेश थे। एनेस्थेसिया से डॉ. अनीता मलिक, डॉ. जी पी सिंह, डॉ. सरिता सिंह और नर्सिंग से सिस्टर वंदना, तकनीशियन संजय थे।
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