लखनऊ। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ट्रॉमा सेंटर में आर्थोपैडिक विभाग के डॉक्टरों ने ट्रेन हादसे में क्षतिग्रस्त हुए एक पैर को काटने में एक सप्ताह गुजार दिया, जब कि जांच में पहले खुद ही पैर काटने का अंतिम निर्णय ले लिया था। आलम यह हुआ कि तड़पते मरीज के पैर में कीड़े पड़ गये आैर बदबू वार्ड में फैल गयी। उधर परिजन डाक्टरों से फरियाद करते रहे। बताया जाता है कि चालीस हजार रुपये की जांच कराने के बाद ही बीती रात उसका पैर आनन-फानन में काट दिया गया।
गोंडा निवासी सर्वेश यादव (26) ट्रेन हादसे में बायां पैर घुटने से नीचे बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था। डाक्टरों ने जांच के बाद पैर काटना ही विकल्प बताया था। परिजनों के अनुसार गोंडा जिला अस्पताल से मरीज को गंभीर हालत में करीब छह दिन पहले केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर रेफर किया गया। ट्रामा सेंटर के इमरजेंसी में भर्ती होने बाद मरीज को आर्थोपैडिक वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। इस दौरान डॉक्टरों ने जांच कराई और पैर जल्द से जल्द काटने का निर्णय लिया। इसके लिए ओटी में प्रयोग होने वाला सामान मंगवा लिया, लेकिन छह दिन बीत गए मगर डॉक्टरों ने उसका पैर नहीं काटा आैर इस दौरान उसकी कई मंहगी जांच करा ली।
इस जांच में लगभग उनका चालीस हजार रुपये खर्च हो गये। इधर दर्द कराहते वार्ड में भर्ती रहने दौरान बदबू से दूसरे मरीज परेशान होने लगे आैर वह सब बेहाल हो गये। बताते है कि संक्रमण की वजह से मरीज के पैर में कीड़े पड़ गए थे। लगातार शिकायत व फरियाद के बाद शनिवार देर रात डॉक्टर मरीज को ओटी में ले गए। जहां पर उसका पैर काटा दिया गया। ट्रामा सेंटर के चिकित्सा अधीक्षक डा. संतोष कुमार का कहना है कि कोशिश पैर बचाने की जा रही थी। इस लिए देरी हो गयी। इलाज में कोई लापरवाही बरती नहीं गयी।
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