लखनऊ। किसी भी प्रकार के अंग प्रत्यारोपण सबसे बड़ी चुनौती एनेस्थीसिया के डाक्टरों की होती है। इस दौरान अंग शरीर में न होने के कारण शरीर को दवा के माध्यम से क्रियाशील रखना होता है। इसके अलावा इन मरीजों में संक्रमण का भी होने का अधिक खतरा होता है। इसलिए उन्हें प्रत्यारोपरण के बाद अगले तीन वर्षों तक बेहद सावधान रहना चाहिए। इसके लिए सबसे बेहतर यह होता है कि वह हाथ मिलाने के बजाय सबसे बेहतर है कि वह प्रणाम करें। खान-पान, किसी भी बीमारी व्यक्ति से मुलाकात आदि से बचना चाहिए।
यह बात दिल्ली के आईएलबीएस अस्पताल से आए प्रो. सीके पाण्डेय ने वह बुधवार को गोमती नगर के डा. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में आयोजित इंडियन सोसाइटी ऑफ एनेस्थियोलॉजिस्ट की सेंट्रल जोन पीजी काफ्रेंस में कही। यह काफ्रेंस एनेस्थीसिया विभाग के तत्वावधान में आयोजित की गयी। संस्थान के एकेडमिक ब्लॉक में आयोजित प्रो. पाण्डेय ने बताया कि किड्नी फेल्योर के मामले में आसानी से नहीं पता नही हो पाता है। मरीज की जब किड्नी के 75 प्रतिशत खराब हो जाती तो इसके बाद ही इसके लक्षण सामने आते हैं।
इसलिए इसके प्रति सजगता बेहद जरूरी होना चाहिए। कार्यक्रम में लोहिया संस्थान में एनेस्थीसिया विभाग के प्रो. पीके दास ने श्वांस की बीमारी क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के इलाज में एनेस्थीसिया के माध्यम से इलाज पर बोलते हुए कहा कि मरीज के फेफड़ों में सक्रमण होता है। इसके इलाज में सावधानी आवश्यक होती है।
उन्होंने बताया कि मरीज को वेंटीलेटर पर भर्ती करने से पहले विभिन्न क्लीनिकल पहलुओं पर ध्यान देना होता है। इसकी विशेषज्ञ डाक्टरों ने निर्देशन में मॉनीटरिंग की जाती है। कार्यक्रम में लोहिया संस्थान के निदेशक प्रो. दीपक मालवीय ने थायराइड के रोगियों में एनेस्थिसिया के महत्व पर जानकारी देते हुए कहा कि यदि किसी थायराइड रोगी का किसी अन्य तरह का ऑपरेशन होना होता तो पहले थायराइड पर नियंत्रण करना आवश्यक होता है। प्रो. मालवीय ने बताया कि पांच दिवसीय इस कार्यक्रम में विशेषज्ञ डाक्टर मौजूद रहेंगे जो कि विभिन्न जटिल बीमारियों में इसकी उपलब्धता की जानकारी देंगे।
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