लखनऊ। केजीएमयू में ट्रामा सर्जरी विभाग द्वारा मंगलवार को विश्व ट्रामा दिवस के अवसर पर सड़क दुर्घटना से बचने के लिए जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर लोगों में यातायात के प्रति जागरुकता लाने के लिए रैली निकाली गयी। इसके अलावा सड़क पर जिन लोगों ने मोटरसाइकिल चलाते समय हेल्मेट नहीं पहन रखा था। उनकों टोपी पहनायी गयी इसके अलावा नुक्कड़ नाटक का भी आयोजन हुआ। इस अवसर पर ट्रामा सर्जरी विभाग के विभागध्यक्ष डॉ.संदीप तिवारी ने बताया कि भारत में हर छह मिनट में सड़क दुर्घटना में घायल एक व्यक्ति की मौत हो जाती है।
डब्लूएचआे की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष ५ मिलियन लोगों की मृत्यु सड़क दुर्घटना की वजह से होती है। जबकि २० मिलियन लोग सड़क दुर्घटना में घायल होकर विभिन्न अस्पतालों में भर्ती होते हैं। प्रो.संदीप तिवारी का कहना है कि हर साल दस लाख लोग हेड इंजरी के शिकार होते हैं। इनमें से ७० प्रतिशत से अधिक मामले सड़क दुघर्टना के होते हैं। हेड इंजरी के ५० प्रतिशत मरीज समय पर इलाज न उपलब्ध होने की वजह से मर जाते हैं जबकि अगर बच गये तो २५ फीसदी लोग विकलांग हो जाते हैं।
डॉ.तिवारी ने बताया कि अगर लोगों में जागरूकता बढ़े और सचते रहें तो दुर्घटनाओं के साथ ही हेड इंजरी के केसों में कमीं आ सकती है।इसके अलावा प्रशासनिक भवन से कुलपति प्रो.एमएलबी भटट् ने ट्रामा जागरूकता रैली को हरी झंडी देकर रवाना किया, इसके बाद प्रो.संदीप तिवारी ने परिसर समेत मुख्ख्य सड़क पर लोगों में जागरूकता बढ़ाई, उन्होंने दो पहिया और चार पहिया वाहन चालकों को रोककर यातायात के नियमों का अनुपालन का आग्रह किया साथ ही सड़क दुर्घटना से होने वाली क्षति की गंभीरता भी बताई।
हर साल पीडियाट्रिक ट्रामा से दम तोड़ते हैं २२ हजार बच्चे: प्रो.अजय सिंह
पीडियाट्रिक आर्थोपेडिक विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अजय सिंह ने बताया कि भारत में पीडियाट्रिक ट्रामा में मरने वाले बच्चों को बचाया जा सकता है,लेकिन कुछ कारणों के चलते यह नहीं हो पा रहा है। बीते १० सालों के आंकड़ें देखें तो पीडियाट्रिक ट्रामा ६५ प्रतिशत बढ़ चुका है। नेशनल क्र ाइम ब्यूरो की रिकार्ड के अनुसार प्रतिवर्ष २२ हजार बच्चों की मौत पीडियाट्रिक ट्रामा की वजह से होती है। इसके बावजूद जिम्मेदार लोग इस मुद्दे को गंभीरता से नही लेते हैं। क्योंकि पीडियाट्रिक ट्रामा और एडल्ट ट्रामा में अंतर है, एक ही सेंटर में एक ही डॉक्टर दोनो का बेहतर इलाज नही कर सकता है। क्योंकि बच्चों के इलाज में विशेष सावधानी बरतनी होती है, पुरूषों के इलाज में दूसरी होती हैं।