लखनऊ। डाक्टर्स डे पर शनिवार को आईएमए भवन सहित कई चिकित्सा संस्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। आईएमए भवन में सायं 4 बजे से शुरु होने वाले कार्यक्रम में मुख्य अतिथि उप मुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा आैर विशिष्ट अतिथि विधायक डा. नीरज बोरा रहेंगे। डाक्टर के व्यवहार को लेकर विशेषज्ञ चिकित्सकों से बातचीत में एक बात खुलकर सामने आएगी कि थोड़ा सुधार की जरूरत है डाक्टर धरती के भगवान थे आैर धरती के भगवान रहेंगे लेकिन थोड़ा सा सुधार की जरूरत है।
डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. आशुतोष दुबे ने बताया कि अगर चिकित्सा को व्यवसायीकरण से दूर रखकर देखा जाना चाहिए। वास्तव में कोई भी अस्पताल लड़ाई करने नहीं आता है, लेकिन चिकित्सा में थोड़ी सी चूक परिजनों के हिंसा का सबब बनती है। कहा गया कि कष्ट में विवेक काम नहीं करता है। कहीं न कहीं चिकित्सकों को गंभीरता से अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। चिकित्सकों में सामाजिक सरोकार की कमी, उनकी व्यावसायिक सोच के कारण रोगी केवल चिकित्सक को सेवा प्रदाता मानने लगा है। केजीएमयू के चिकित्सा अधीक्षक तथा प्लास्टिक सर्जन डॉ. विजय कुमार ने बताया कि डाक्टर आैर मरीज के सम्बन्ध में दूरियां ज्यादा है। इसके चलते मरीजों में चिकित्सक के प्रति अविश्वास की भावना बढ़ रही है।
एक चिकित्सक को मरीज की बीमारी समझने के साथ उसको भी समझने की जरूरत होती है। मरीज जब हमारे पास पहुंचता है, तो उसकी हालत काफी गम्भीर होती है। ऐसे में उसे किसी से अपनापन मिल जाये तो वह अपना पन उसे अन्दर से ताकत देता है। केजीएमयू के गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डा. सुमित रूंगटा ने बताया कि यदि चिकित्सक तथा मरीज अपनी भावना बदले तो स्थिति सामान्य हो सकती है। वहीं चिकित्सकों पर भी दबाव बढ़ा है। मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई बार गम्भीर मरीज को इलाज ही नहीं मिल पाता है। हमारे यहां प्राइमरी तथा सेकेण्डरी लेवल की स्वास्थ्य सेवायें खस्ता हाल है। इससे केजीएमयू पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि पहले के समय में मेडिकल कालेज में चिकित्सा की पढ़ाई होती थी, लेकिन अब मेडिकल कालेज अस्पताल बनते जा रहे हैं।
सामान्य मरीज भी मेडिकल कालेज में इलाज के लिए आ रहे हैं। केजीएमयू के चेस्ट रोग विशेषज्ञ डा. संतोष कुमार की माने तो पहले के समय में चिकित्सक को भगवान का दर्जा दिया जाता था,लेकिन आधुनिकता के इस दौर में सेवा के इस क्षेत्र में व्यावसायिकता हावी हो गयी है।