वीडियो असिस्टेड थोरोसिक सर्जरी से की फेफड़े की जटिल सर्जरी

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लखनऊ। फेफड़ों में मवाद जम जाने पर प्यूरल इम्पाइमा बीमारी हो जाती है। अगर इस बीमारी में मरीज जल्द विशेषज्ञ डाक्टर से इलाज कराने पहुंचता है, तो वीडियो असिस्टेड थोरोसिक सर्जरी की जा सकती है, जिसमें उच्चस्तरीय तकनीक से की गयी, इस सर्जरी से मरीज को तीन से चार दिन में दैनिक दिनचर्या करने लगता है, जबकि देर से आने पर मवाद की मोटी परत जम जाने पर जनरल सर्जरी करनी पडती है। इस सर्जरी में दस से 15 दिन तक आराम करना पड़ता है। इन दो अलग-अलग मामलों को किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में जनरल सर्जरी के पल्मोनरी यूनिट के प्रभारी प्रो. सुरेश कुमार ने दोनों सर्जरी का वीडियो दिखाते हुए तुलनात्मक जानकारी दी। उन्होने बताया कि वीडियो असिस्टेड थोरोसिक सर्जरी बेहद जटिल एवं खर्चीला माना जाता है। इसमें दिल्ली, मुम्बई में चार से पांच लाख का खर्च आ जाता है। प्रदेश में बहुत कम ही बड़े अस्पताल इस तकनीक से सर्जरी करते है।

डा. सुरेश ने पत्रकार वार्ता में बताया कि इस बीमारी को टीबी का ही एक प्रकार माना जाता है, जिसमें फेफड़ों के ऊपर प्यूरल झिल्ली की मवाद की मोटी परत जम जाती है। जिसकी वजह से फेफड़े पूरी तरह से काम नहीं कर पाते हैं। इलाज में लापरवाही अथवा बीमारी का पता न चलने पर यह एक गंभीर समस्या बन जाती है। उन्होंने बताया कि आमतौर पर इस बीमारी का इलाज ओपन सर्जरी के द्वारा इसका इलाज मुमकिन है, लेकिन उसमें मरीज का खून ज्यादा बहने के साथ ही दर्द अधिक होता है साथ ही सुधार की प्रक्रिया काफी धीमे होती है, जबकि वीडियो असिस्टेड थोरोसिक सर्जरी से कम दर्द के साथ ही ब्लीडिंग कम होती है। इस तकनीक सर्जरी को करने में उन्हें चार घंटे का वक्त लगा। जिसमें फेफड़ों पर जमी ऊपरी परत को हटा दिया गया।

डॉ. कुमार ने बताया कि पहला मामला आजमगढ़ निवासी रूख्सार बानो (बदला हुआ नाम)का है। इस पेशेंट को जुलाई 2017 में टाइफाइड बुखार हुआ था। जिसका इलाज 6 माह तक आजमगढ़ में ही चला। इसके साथ ही इनका इलाज कर रहे डॉक्टर ने उनकी टीबी की दवा भी चालू कर दी। इलाज के बाद भी ठीक न होने पर एक्स-रे कराने पर पता चला कि मरीज के फेफड़े में पस हो गया है, जिसका इलाज आजमगढ़ में ही हुआ और मरीज के फेफड़े में एक ट्यूब डाल दी गई। इसके साथ ही मरीज का इलाज बलिया में भी चला लेकिन कोई फायदा न होने के कारण छह जुलाई को मरीज को यहां लाया गया। जहां मरीज की विभिन्न जांचे, एक्स-रे एवं सीटी स्कैन किया गया। इसके बाद डॉक्टरों की एक टीम ने डॉ. सुरेश कुमार के नेतृत्व में इस मरीज का ओपन ऑपरेशन 31अक्टूबर को किया, जो कि सफल रहा और फिलहाल मरीज पूर्णतः स्वस्थ है। इस ऑपरेशन का कुल खर्च में 50 हजार आया।

वहीं इसी प्रकार का दूसरा मामला लखीमपुर की शिवानी (बदला हुआ नाम) का है। इस मरीज का इलाज 13 जुलाई को लखीमपुर कें निजी अस्पताल में पहली बार शुरू किया गया। जिसके तहत 16 जुलाई को फेफड़े से सिरिंज द्वारा मवाद निकाला गया, लेकिन तीन माह बाद ही पुनः फेफड़े में मवाद भरने के बाद बाद दिनांक 29 अक्टूबर को मरीज को केजीएमयू में भर्ती किया गया। मरीज की सर्जरी पांच नवंबर को वीडियो असिस्टेड थोरोसिक सर्जरी से की गयी। जो पूर्णतः सफल हुआ और मरीज अब स्वस्थ है। इस ऑपरेशन में मरीज का लगभग 25 हजार रूपए खर्च हुए। सर्जरी टीम में उनके अलावा डॉ. संजीव कुमार, डॉ. गणेश यादव, डॉ. मैरी तथा ऐनेस्थीसिया में डॉ. दिनेश सिंह व डॉ. अभिषेक एवं नर्सिंग स्टाफ के तौर पर इंदु यादव थी।

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