लखनऊ । किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के अेारल एंड मैक्सिलोफेसियल विभाग में पहली आंख की कृत्रिम आर्बिटल बना दी। डाक्टरों का दावा है कि अब तक यह आर्बिट हड्ी से बनायी जाती थी, लेकिन पहली बार आंख की चारो ओर की आर्बिटल टाइटेनियम से बना दी गयी। इसके लिए कम्प्यूटर ग्राफिंग से मदद ली गयी। यह सर्जरी वरिष्ठ डा. दिव्या मेहरोत्रा के नेतृत्व में की गयी। डाक्टरों का दावा है कि मरीज एम्स से लौटा दिया गया था, लेकिन यहां पर डाक्टरों की टीम ने सफल सर्जरी करके उसे नयी जिंदगी दे दी।
उन्होंने बताया कि सड़क दुर्घटना में राजस्थान निवासी युवक एक्सीडेंट में बुरी तरह घायल हो गया था। एक्सीडेंट में जबड़े व आंख में गम्भीर चोट आयी थी। मरीज को बेहतर इलाज के लिए एम्स भी गया था लेकिन यहां पर जबड़े का इलाज तो किया गया, लेकिन आंख से दो दिखना व बायीं आंख दायी आंख की तुलना में ज्यादा दबा हुआ लग रहा था। बताया जाता है कि मरीज ने कई अस्पतालों में इलाज कराया लेकिन कोई सफ लता नहीं मिली। केजीएमयू मे दंत संकाय में डा. दिव्या को आंख आैर जबड़ा दिखाया। यहां पर आंख की सीटी स्कैन कराया गया।
सीटी स्कैन कराने पर पता चला कि आंख के चारो ओर की आर्बिटल क्षतिग्रस्त थी उसे दोबारा बनाया जाना एक चुनौती थी। डा. दिव्या ने बताया कि आंख की आर्बिटल को अब तक हड्डी से बनाया जाता था, जिसके बनाने में दिक्कत आती थी आैर फिनेशिंग टच नहीं आ पाता था। इसके लिए आंखों की आर्बिटल के लिक क म्प्यूटराइज तकनीक से ग्राफिंग करके टाइटेनियम की दीवार बनायी गयी। कहने को तो यह सरल होता है लेकिन फ्रेमिंग करके आंखे में सेट करना बेहद जटिल काम है। सर्जरी के बाद मरीज को बायी आंख से स्पष्ट दिख रहा है। उन्हांेने बताया कि उनकी टीम में डा. संजय कुमार, डा. पवन गोयल तथा डा. जगदीश शामिल थे। जब कि एनेस्थिसिया डा. सतीश धस्माना व उनकी टीम ने दिया।















