लखनऊ। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में मरीज की किडनी चोरी करने के प्रकरण में दोनों डाक्टरों पर लगे आरोपों पर बिना क्लीनिकल जांच के बाराबंकी पुलिस द्वारा रिपोर्ट दर्ज करने के मामले में आईएमए के पूर्व सचिव व केजीएमयू के वरिष्ठ यूरोलॉजिस्ट, गुर्दा रोग विशेषज्ञ तथा सर्जन डा. विश्वजीत ने आश्चर्य प्रकट किया है। उनका कहना है कि पुलिस सीधे धाराओं में कभी वरिष्ठ डाक्टरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज ही नही कर सकती है।
उन्होंने कहा कि कई मामले उनके संज्ञान में किडनी है जिनमें मरीज किडनी गायब होने की शिकायत की, लेकिन प्राथमिक जांच में ही दो जांच से स्पष्ट हो जाता है कि किडनी निकाली गयी या नहीं। उन्होंने बताया कि एंजियोग्राफी डीएसए तकनीक से करायी जाती है। इसमें स्पष्ट हो जाता है कि किडनी निकाली गयी कि नहीं। इसके अलावा न्यूक्लियर स्कैन होता है, इसमें भी पता चल जाता है कि किडनी थी कि नही। अगर किडनी निकाली गयी होगी तो धमनियों में कट का निशान लगा होता है। उन्होंने कहा कि एक अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के आधार पर कुछ नहीं क हा जा सकता है।
- अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के नीचे लिखा होता है कि मेडिकल लीगल में प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
- आखिर क्यों नहीं किया सकता है इस लिए कि अक्सर अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट गलत होती है अगर आपरेशन के दौरान किडनी नीचे खिसक गयी आैर दिख नहीं रही हो।
- सामान्य तौर पर जांच करने वाला निर्धारित स्थान पर ही देखता है।
- इसके अलावा यह भी हो सकता है कि आंकड़ों के अनुसार ग्यारह सौ मरीजों में एक मरीज में सिर्फ एक किडनी ही पायी जाती है।
- यह भी सम्भव है। उन्होंने बताया कि कुछ वर्ष पहले एक मरीज आया था अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट लेकर कि उसकी किडनी नही है।
- उनके यहां अल्ट्रासाउंड में किडनी नीचे खिसकी पायी गयी थी।
- उन्होंने कहा कि यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि अगर मरीज आता है आैर उसके आंत फटी है आैर गंदा पानी भरा है तो किडनी संक्रमित हो जाती है।
- इसलिए बिना किसी जांच के यह कहना मुश्किल होगा कि किडनी निकाल ली गयी।















