इंडियन सोसायटी ऑफ हिमेटोलॉजी एवम ब्लड ट्रांसफ्यूजन और यूरोपियन हिमेटोलॉजी असोशिएशन के तत्वावधान में तृतीय ट्यूटोरियल के आयोजन के दूसरे दिन सत्र के प्रारंभ में चेक रिपब्लिक से आये डा. मार्क ट्रेने ने बताया कि हाइ ग्रैड लिम्फोमा की अगर सही समय पर पहचान हो जाये और उचित उपचार मिल जाये तो व्यक्ति की क्वालिटी ऑफ लाइफ को बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि रक्त कैंसर का उपचार स्टेज पर निर्भर करता है । व्यक्ति विशेषज्ञ के पास फस्ट स्टेज पर आया है या फोर्थ स्टेज पर। शोध के आधार पर ये बात निकल कर आई है की लिम्फोमा के उपचार के दौरान लगभग 2 महीने के बाद एक टेस्ट जैसे पेट सीटी कर लिया जाए तो उससे ये पता लगता है कि उपचार का कितना लाभ मिल रहा है। ये रेस्पॉन्स ओरियंटेड होता है। अगर उपचार में पूर्ण लाभ मिलता है तो ज्यादा नुकसान पहुचाने वाली दवाओं की मात्रा को कम किया जा सकता है।
लिम्फोमा के उपचार किमोथेरफी के साथ इम्मयून थेरेपी भी दी जाती है इस पर शोध जारी है। हाई ग्रेड लिम्फोमा तथा हाच्किन्स लिम्फोमा में बोन मैरो ट्रांसप्लांट कब और कितना जरूरी है ये कीमोथेरेपी उपचार के फेल होने पर निर्भर करता है। कीमोथेरपी के फैल होने पर ही बोन मेरो ट्रांसप्लांट कराया जाए।
केजीएमयू के हिमेटोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डा.एके. त्रिपाठी ने बताया कि मायलोमा जो कि एक प्रकार का केन्सर है ये अलग अलग रूप में आता है, इसको पहचानना मुश्किल होता है। इसमें हड्डिया कमजोर हो जाती है।, गुर्दे में खराबी आती है मरीज के शरीर मे जब रक्त की कमी हो जाती है तब वह विशेषज्ञ के पास आता है। जो कि शायद आखिरी अवस्था होती है। इसकी पहचान के लिए एक रक्त जांच होती है जो कि मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध है, जिसमे विशेष प्रकार के पैरा प्रोटीन की जांच की जाती है। इसके उपचार में कीमोथेरपी का उपयोग नही किया जाता है इसलिए इसे कीमोथेरेपी मुक्त इलाज भी कहा जाता है।
अब PayTM के जरिए भी द एम्पल न्यूज़ की मदद कर सकते हैं. मोबाइल नंबर 9140014727 पर पेटीएम करें.
द एम्पल न्यूज़ डॉट कॉम को छोटी-सी सहयोग राशि देकर इसके संचालन में मदद करें: Rs 200 > Rs 500 > Rs 1000 > Rs 2000 > Rs 5000 > Rs 10000.











