लखनऊ। पार्किसन्स रोग मस्तिष्क की ऐसी पहली डीजैनरेटिव डिजीज है जिसमें डोपामीन नामक रसायन की कमी हो जाती है। इसम लीवाडोपा दवा के प्रयोग से फ ायदा तो मिला, लेकिन दवा के साइड इफेक्ट भी बढ़े। ऐसे लोगों में सर्जरी द्वारा डीपब्रोन स्टिमुलेशन से रोगी को फायदा मिल सकता है। अभी प्रदेश में यह सर्जरी नहीं हो सकती है।यह दिल्ली, मुम्बई कोलकाता, चेन्नई, बैंगलूरु, तिरुवन्तपुरम तथा गुरुग्राम हो सकती है।
इसके अलावा अभी स्टेम सेल थेरेपी, जीन थेरेपी तथा न्यूरल ट्रांसप्लन्टेशन इलाज पर शोध चल रहा है। बताते चले कि मस्तिष्क में होने वाले डीजैनरेटिव डिजीज में पार्किंसन्स डिजीज का दूसरा स्थान है। जनसंख्या में का 0.3 प्रतिशत हिस्सा इससे ग्रस्त है लेकिन 60 वर्ष की उम्र के बाद इस बीमारी का आकंड़ा बढ़ कर दो प्रतिशत रह जाता है। अगर देखा जाए तो चालीस लोगों में एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में इस बीमारी से ग्रस्त रहता है।
यह जानकारी न्यूरोफ ीजियन डा. राकेश शुक्ल 11 अप्रैल को मनाये जाने वाले विश्व पार्किसन दिवस की पूर्वसंध्या पर दी। उन्होंने बताया कि बढ़ती उम्र के साथ यह बीमारी होने की ज्यादा आशंका होती है। महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में यह बीमारी होने की आशंका डेढ़ गुना ज्यादा होती है। डा. शुक्ल ने बताया कि पार्किंसन्स डिजीज के कारण का अभी तक ठीक से पता नहीं चल पाया है, पर आनुवंशिक तथा ,ऐनवायरमेंटल दोनों ही कारणों का रोग बढ़ाने में योगदान है। पार्किन जीन में लगभग 11 प्रकार के म्यूटेशन पाये गये है। मैगनीज, कीटनाशक पदार्थ, कार्बन मोनोआक्साइड, एमपीटीपी, सिर की चोट तथा किसी वायरस के कारण भी रोग हो सकता है।
इस बीमारी में मस्तिष्क के गहरे केन्द्रीय भाग में स्थित एक विशिष्ट संरचना स्ट्राएटम की कोशिकाएं में गड़बड़ी शुरू हो जाती है। सब्सेंटशिया नाइग्रा कर न्यूरान कोशिकाएं की संख्या कम होने लगती है। उनकी जल्दी मौत हो जाती है। इसके प्रारम्भिक लक्षण कम्पन है जो कि उंगली हाथ पैर में हो सकता है। समस्त गतिविधियों में धीमापन व्याप्त हो जाता है। चाल धीमी आैर काम धीमा हो जाता है। मांसपेशियों की स्फूर्ति में काम करने की क्षमता कम हो जाती है।
खड़े होते समय व चलते समय मरीज सीधा तनकर नहीं रहता थोड़ा सा आगे की ओर झुक जाता है। चेहरे कर रौनक बदल जाती है आैर चलते समय कभी -कभी अचानक रोगी की गति बढ़ जाती है। डा. शुक्ल ने बताया कि इसकी खास बात यह है कि इस बीमारी के लक्षणों का वर्णन जानने के बाद व उसके शरीर का अवलोकन करने के बाद दवा दी जा सकती है। इसकी पुष्टि के लिए कोई प्रयोगशाला, जांच, एक्सरे, सीटी स्कैन या एमआरआई स्कैन नहीं होता है।