लखनऊ । थैलीसीमिया के बच्चों में अब नयी तकनीक से बोन मेरो प्रत्यारोपण आसान हो गया हंै, जिससे थैलीसीमिया के बच्चों के भाई-बहन न होने वालों जीवनदान मिला है। यह जानकारी डा. अर्चना नारायण ने होटल ताज में आयोजित ट्रांसमेडिकॉन कार्यशाला में दी। कार्यशाला में ब्लड के नये एंटीबाडी की जानकारी देने के अलावा ब्लड बैंकों की तकनीक व्यवस्था सुधारने पर भी बल दिया गया।
जयपुर से आयी डा. अर्चना ने बताया कि अभी तक बोनमेरो प्रत्यारोपण में भाई बहन का प्रयोग किया जाता था, पर अब माता पिता से बोन मेरो तकनीक हाप्लो 16 से प्रत्यारोपण किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इसमें काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। माता पिता से बोन मेरो 60-70 प्रतिशत तक ही मैच होती है। शेष में तकनीक व प्रोटोकॉल का गंभीरता पूर्वक फालोअप करने में सफलता मिलती है। उन्होंने बताया कि यह तकनीक बिना भाई बहन वालों में बेहद कारगर है। अब तक 68 मरीजों में यह सफलता मिल चुकी है।
गुजरात के लोक सपर्मण रक्तदान केन्द्र के निदेशक डा. सम्मुख जोशी ने बताया कि वर्ष 2016 में एक नया एंटीबाडी की खोज उन्होंने की है। आईएन -5 नाम का एंटीबाडी अभी तक किसी भी ब्लड ग्रुप में नहीं पाया गया है। यह एंटीबाडी इनरा नामक मरीज में मिली है, इसमें अभी शोध चल रहा है। उन्होंने बताया कि आईएन -1 की खोज 1973 में उन्होंने की है। केजीएमयू की ब्लड ट्रांसफ्यूजन प्रभारी डा. तूलिका चंद्रा ने बताया कि ब्लड बैंको आटोमेशन किया जाना आवश्यक है। इसके प्रयोग से कई लोगों की जान बचायी जा सकती है। प्रदेश में अभी भी काफी संख्या में ब्लड बैंक मैनुअल चल रहे है। ब्लड ग्रुप व अन्य सटीक जानकारी आटोमेशन तकनीक के प्रयोग से मिल जाती है। इससे ब्लड की सभी जानकारी ऑनलाइन रहती है।
कार्यशाला में डॉ. हर्ष अग्रवाल, चंडीगढ़, ने बताया कि हमे रक्त की आवश्यकता को कम करने के तरीकों के बारे में सोचना चाहिए। इसके लिए शल्यक्रिया से पहले दवाओं के बारे मे सोचना चाहिए कि किस प्रकार रक्त स्राव को कम करें, और जो रक्त का स्राव हो रहा है उसे फिर से साफ कर मरीज को चढ़ाने के बारे में।












