लखनऊ – ब्लड कैंसर, ए-प्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में बाधा बन रहे ईड-वन जीन की पहचान की गई है। इसको अब जैक-स्टैट कीमोथेरेपी से नियंत्रित किया जा सकेगा, जिससे मरीजों में स्टेम सेल बनने की क्षमता बढ़ जाएगी। बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीजों को इसका फायदा मिलेगा। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च सेंटर के डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह ने इस जीन की खोज की है। यह रिसर्च अमेरिका के प्रतिष्ठित जर्नल सेल स्टेम सेल में दो अगस्त को प्रकाशित की गयी है। केजीएमयू में बोन मेरो प्रत्यारोपण की कोशिश की जाएगी।
अस्पतालों व मेडिकल कालेजों के आंकड़ों को देखा जाए तो ब्लड कैंसर के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। आश्चर्य है कि इसकी चपेट में बच्चे अधिक मात्रा में आ रहे हैं। इनके अलावा बड़ी उम्र वाले भी ब्लड कैंसर की चपेट में आ रहे हैं। इस बीमारी के मरीजों को इलाज कराने में भी काफी दिक्कते आती रहती है। इसके अलावा ए-प्लास्टिक जैसी खून की बीमारी की चपेट में भी लोग आ रहे हैं। इसमे खून न बनने वाले व कमी वाली इन बीमारियों का इलाज स्टेम सेल थेरेपी से किया जाता है। इस थेरेपी में बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जाता है। कई मामलों में यह स्टेम सेल कारगर नहीं हो पाती हैं। ईड-वन जीन की वजह से स्टेम सेल काफी कम मात्रा में बन पाती हैं। इसकी पहचान न होने से इलाज कारगर नहीं हो पाता है।
केजीएमयू के सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च के डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह का दावा है कि ईड-वन जीन कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ाने का काम करता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट होने के बाद इन कोशिकाओं के खत्म करने की रफ्तार को धीमा कर देता है। उन्होंने बताया कि इस जीन की पहचान तो की ही जा चुकी है, साथ ही इसको खत्म करने या इसको रोकने के लिए जैक-स्टैट कीमोथेरेपी का प्रयोग किया जाएगा। इससे मरीज की सेहत में तेजी से सुधार होगा।
डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह के मुताबिक एक बार बोन मैरो ट्रांसप्लांट में आठ लाख रूपए से ज्यादा तक खर्च हो हो जाते है। ईड-वन की वजह से ये एक बार में कारगर नहीं होते थे, जिसकी वजह से दो से तीन बार बोन मैरो कराना पड़ता था। अब इस शोध के बाद इसकी जरुरत नहीं पड़ेगी। केजीएमयू में इसको शुरू करने की कवायद की जा रही है। उन्होंने बताया कि इस जीन की पहचान तो की ही जा चुकी है, साथ ही इसको खत्म करने या इसको रोकने के लिए जैक-स्टैट कीमोथेरेपी का प्रयोग किया जाएगा। इससे मरीज की सेहत में तेजी से सुधार होगा।
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