जांच शुल्क तो कम होगा, पर कितना

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लखनऊ । किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय प्रशासन ने शनिवार को महत्वपूर्ण लेते हुए मरीजों बढ़ी हुई जांच शुल्क को वापस लेने का निर्णय लिया गया है। इसके साथ ही बेड शुल्क, प्राइवेट वार्ड आदि के भी बढ़े शुल्क लेने की घोषणा की गयी है। इस पर अंतिम निर्णय केजीएमयू अस्पताल सलाहकार बोर्ड की बैठक के बाद लिया जाएगा, पर पीपीपी मॉडल पर चल रही पैथालॉजी व अन्य जांच शुल्क किस अनुपात में कम होगा। इसके लिए कमेटी का भी गठन क र दिया गया है।
केजीएमयू के पूर्व कुलपति प्रो. रविकांत ने पैथालॉजी सहित अन्य कई विभागों को पीपीपी माडल के तहत जांच शुल्क बढ़ा दिये गये थे। पैथालाजी में तो कुछ जांच शुल्क इतने ज्यादा हो गये थे कि बाहर की निजी पैथालॉजी को भी मात कर देते थे। मरीज बाहर ही जांच कराना पसंद करने लगा था।

पीपीपी माडल के जांच की व्यवस्था में भी कई दिक्कते आ रही थी। मरीजों को जांच के लिए नमूना देने के बाद दो से तीन दिन जांच रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ता था। इसके अलावा बेड शुल्क भी वातानुकूलित वार्डो के अनुसार बढ़ा दिया गया था। प्राइवेट वार्डो में सुविधाओं के नाम पर शुल्क तो बढ़ा दिया गया था लेकिन सुविधाएं नही बढ़ी थी। पूर्व कुलपति प्रो. रविकांत का मानना था कि कारपोरेट स्तर पर केजीएमयू को बेहतर बनाने के लिए सख्त नियम उठाने होगे। नये नियमों से पीपीपी माडल वालों को तो फायदा हो रहा था, लेकिन सामान्य मरीज बेहाल था। जांच के शुल्क तो ज्यादा थे ही ,लेकिन जांच में समय पर नहीं मिलने से वह बेहाल रहते थे।

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पैथालॉजी से लेकर ट्रामा सेंटर तक पीपीपी मॉडल के तहत काम होने लगा था। जानकारों का मानना है कि जांच शुल्क कम करने के लिए सलाहकार बोर्ड के अलावा पीपीपी मॉडल पर काम करने वाली कम्पनियों से भी वार्ता करनी होगी। अगर कोई जांच का शुल्क बढ़ा है आैर रीजेंट भी महंगा हो गया है तो केजीएमयू अपने प्रतिशत कम करेगा या चलाने वाली कम्पनी घाटा उठायेगी। हालांक इसके लिए कमेटी का गठन किया गया है जो कि हर पहलुओं को देखते हुए शुल्क कम करने का प्रस्ताव बोर्ड को देगी।

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