लखनऊ। एंटीबायोटिक दवाएं,कास्मेटिक का अधिक प्रयोग और बदलती जीवन शैली में खान-पान की वजह से लोगों में एलर्जी की समस्या बढ़ रही है। आधुनिक जीवन शैली में छोटी- छोटी लापरवाही बड़ों से लेकर बच्चों तक को बीमार बना रही है। यह बात शनिवार को कन्वेंशन सेंटर में तीन दिवसीय 51 वीं ईकाइकॉन में केजीएमयू के प्रो.सूर्यकांत में कही। अधिवेशन में देश-विदेश से सैकड़ो विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया है।
कन्वेंशन सेंटर चल रही एलर्जी और अस्थमा अधिवेशन में प्रो.सूर्यकांत ने बताया कि परिवेश में कट रहे पेड़ के अनुपात में वृक्षारोपण नहीं हो रहा है। इसके अलावा डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ के अलावा फास्टफूड भी शामिल है। उन्होंने डाक्टरों से अपील करते हुए कहा कि बिना जरूरत या मामूली चोट में भी एंटीबायोटिक दे दिया जाता है। प्रो.सूर्यकांत ने बताया कि एलर्जी के साथ ही फंगल के शामिल होने से दमा मरीजों की दिक्कतों को दोगुना कर देता है। इस बीमारी को एलर्जिक ब्रांको पल्मोनरी एसपर्जिलेट कहते हैं। कूलर के पानी से दिक्कत हो सकती है। उन्होंने बताया कि कूलर में रहने वाले दमा रोगियों को यह बीमारी होने की संभावना होती है। इसके लिए सीटी स्कैन कराये, ब्लड टेस्ट, स्नो फिलिया का टेस्ट कराना चाहिये।
प्रो.सूर्यकांत ने बताया कि भारत में तीन करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, इस समस्या की रोकथाम के लिए जीवन शैली और संतुलित आहार को करना चाहिये। यूके के इंडो बायोटेक्रोलॉजी के निदेशक डॉ.जे स हेडली ने कंट्रोल एंड से टी विषय पर बताया कि हर व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता अलग होती है। कोई जल्द ही बीमार पड़ जाता है तो किसी को किसी ााद्य पदार्थ से एलर्जी हो सकती है। लोग समझ नहीं पाते हैं और समस्या होने पर एंटीबायोटिक आदि दवाओं का सेवन करते रहते हैं, जिससे समस्या बढ़ती है। काफी लोगों को भोज्य पदार्थो की एलर्जी होती ।
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