फोरेंसिक जांच से पता चलेगी सही उम्र

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लखनऊ। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के कलाम सेन्टर में शुक्रवार को आयोजित दो दिवसीय इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑन फोरेंसिक ओडोंटोलॉजी को बतौर विशिष्ट अतिथि सीबीआई के डायरेक्टर डा. जीके गोस्वामी ने कहा कि दिल्ली निर्भया कांड में एक युवक साढ़े सत्रह साल उम्र का हवाला देकर जुवेनाइल श्रेणी में चला गया। उसका केस हल्का हो गया। कारण, यदि फारेंसिक जांच में छह माह से कम ज्यादा उम्र का अंतर हुआ तो कोर्ट शैक्षणिक दस्तावेजों का बेस लेता है।

केजीएमयू में इंटरनेशनल कांफ्रेंस –

जब अपराधी की उम्र का सटीक आकलन होने लगेगा तो वह उम्र में हेरफेरी नहीं कर पाएगा। फोरेंसिक जांच से नाबालिग होने का बहाना नहीं चलेगा, उन्हें कठोर सजा मिलेगी। महिपाल मेडिकल कॉलेज कर्नाटक के डा. जी. प्रदीप ने बताया कि देश में चाइल्ड लेबर के केस सबसे ज्यादा हैं। मिनिस्ट्री ऑफ लेबर अक्सर छापेमारी करके ऐसे बच्चों की आयु निर्धारण के लिए आते हैं। इन बच्चों को लेबर एक्ट के तहत उनकी उम्र की जांच की जाती है, इससे उनकी सटीक जांच होती है।

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हड्डियों और दाँतों के विकास को मॉनिटर करके उनकी उम्र पता चलता है। उन्होंने बताया की आयु निर्धारण सबसे ज्यादा 5 साल से 18 साल तक के बच्चों में पता चलता है। इसके लिए उनके बोनस और दाँतों के एक्स-रे से उनके डेवलपमेंट को रिकॉर्ड सैम्पल डाटा से तुलना करके 95 प्रतिशत तक उनकी सटीक आयु बता सकते हैं।

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