लखनऊ – प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर डाक्टरों के प्रति दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ ने आंदोलन का राह पकड़ने का फैसला किया है। संघ के अध्यक्ष अशोक कुमार यादव ने सोमवार को यहां पत्रकार वार्ता में कहा कि डाक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों को कुछ निहित स्वार्थो के चलते अव्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं में कमी के लिये जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि दोषपूर्ण नीतियों के बनाने वालों को जवाबदेही से बचाया जा रहा है।
उन्होने कहा कि चिकित्सा स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवाओं में गैर जिम्मेदाराना रवैये से क्षुब्ध डाक्टर अपने मौलिक अधिकार और सम्मान के लिये सरकार और जनता का ध्यान आकर्षण करने के लिये 24 सितम्बर को मुख्यमंत्री को ज्ञापन देंगे । जबकि एक अक्टूबर को राज्य भर के डाक्टर आक्रोश व्यक्त करने के लिये काली पट्टी बांधेंगे। डा यादव ने कहा कि संवर्ग के डाक्टर से विकल्प लिये बिना, अधिवर्षता आयु मनमानें ढंग से बढाये जाने तथा पाा चिकित्सकों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का लाभ नही दिया जाना और उन्हें केवल गुलाम बनाकर छोड दिया जाना किसी हालत में सहन नही किया जा सकता है।
उन्होने कहा कि, दोहरी व्यवस्था के तहत चिकित्सा इकाईयों में रूपये ढाई लाख तक, प्रतिमाह वेतन पर चिकित्सक बिडिंग के माध्यम से माा आठ घण्टें के लिये नियुक्त किये जा रहे है और उनसे मेडिकोलीगल पोस्टमार्टम इत्यादि कार्य नही लिये जाने का नियम भी प्रख्यापित किया गया है, जबकि लोक सेवा आयोग से चयनित नवनियुक्त चिकित्साधिकारियों को माा रूपये 60 से 70 हजार प्रतिमाह वेतन प्रदान किया जाता है और उनसे दिन रात मेडिकोलीगल कार्य समेत सभी राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के काम लिये जाते है। चिकित्सक ने कहा कि यदि राज्य की चिकित्सा सेवायें इसी प्रकार दोहरी व्यवस्था के तहत चलाया जाना जनहित में है तो सभी सेवारत डाक्टर, सेवा मुक्त होकर उक्त संविदा नियमों के तहत पारितोषिक स्वरूप ढाई लाख रूपये प्रतिमाह के वेतन पर कार्य करने के लिये तैयार है।
डा यादव ने कहा कि 22 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले इस राज्य में दिन रात सेवा करने वाले सरकारी डाक्टरों को अपमान, प्रताड़ना और गुलामी का शिकार बना दिया गया है। कर्तव्यनिष्ठा, कठोर परिश्रम और जीवन भर में अर्जित योज्ञता के लिये प्रोत्साहन देने के बजाय संवर्ग के चिकित्सकों के मौलिक अधिकारों तक को दरकिनार कर दिया गया है। ऐसे में दशकों से सेवारत चिकित्सक हताश और कुंठित हैं वहीं नये चिकित्सक नियमित राजकीय सेवा में आने से कतरा रहे है। इसके चलते प्रान्तीय चिकित्सा स्वास्थ्य सेवा संवर्ग के मृत प्राय: होने का खतरा बढ गया है।
उन्होने कहा कि गैर तकनीकी आधारित नीतियों के चलते पटरी से उतरी चिकित्सा सेवाओ की बदहाली के लिये चिकित्सकों और चिकित्सा कर्मियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि विभाग में दोहरी-तिहरी अव्यावहारिक और मनमानी व्यवस्थाओं के चलते चिकित्सा सेवायें, अराजकता और दिशाहीनता की तरफ बढ रही हैं। राज्य में सरकार की घोषित प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिये जरूरत के मुताबिक एक चौथाई से भी कम चिकित्सक और चिकित्सा कर्मी उपलब्ध है।
चिकित्सक ने कहा कि अस्सी के दशक में सरकार द्वारा स्वयं निर्धारित जन-स्वास्थ्य के मानक आज तक भी प्राप्त नही किये जा सके हैं। इस वास्तविकता को न केवल दबाया और छुपाया जा रहा है। कई गुना काम के बोझ में दबे स्थाई डाक्टर और चिकित्सा कर्मियों को स्वास्थ्य सेवाओं में कमी के लिये जिम्मेदार ठहरा कर निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे हालात में क्षुब्ध होकर चिकित्सक ने आन्दोलन की राह पर जाने फैसला किया है।
संघ के महामंत्री डॉ. अमित सिंह ने बताया कि सेवा सम्बन्धी प्रकरणों तथा चिकित्सा सेवाओं के प्रभावी बनाने के लिये संगठन लगातार सरकार का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रहा है लेकिन, प्रभावी कार्यवाही के नाम पर प्रगति, बेहद निराशाजनक है। प्रोन्नति समेत अन्य लम्बित मामलों को लेेकर तथा सॉतवे वेतन आयोग के क्रम में प्रैक्टिस बन्दी भत्ते सहित अन्य भत्तों के अभी तक प्रदान नही किये जाने से पूरा संवर्ग आक्रोशित है।
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