लखनऊ। शारीरिक सक्रियता में कमी, लगातार बढ़ता तनाव, घंटों स्क्रीन के सामने काम और बाहर के खानपान का सीधा असर अब युवाओं की सेहत पर दिखाई दे रहा है। कम उम्र में ही युवाओं की हृदय धमनियों (coronary arteries) में लंबे ब्लॉकेज मिलने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
लोहिया संस्थान की ओपीडी में चौंकाने वाले आंकड़े
डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) की कार्डियोलॉजी ओपीडी में 30 से 40 वर्ष की उम्र के मरीजों की एंजियोग्राफी के दौरान छह से आठ सेंटीमीटर तक के ब्लॉकेज सामने आ रहे हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, महज पांच साल पहले तक इस आयु वर्ग में सामान्यतः एक से दो सेंटीमीटर के ही ब्लॉकेज मिलते थे। स्थिति इतनी गंभीर है कि कई मरीजों में एक से अधिक धमनियां प्रभावित पाई जा रही हैं, जिसके चलते कम उम्र में ही एंजियोप्लास्टी की जरूरत पड़ रही है।
ओपीडी में हर दिन पहुंच रहे दर्जनों युवा मरीज
लोहिया संस्थान के हृदयरोग विभागाध्यक्ष डॉ. भुवन चंद्र तिवारी ने बताया कि कार्डियोलॉजी ओपीडी में रोजाना लगभग 200 मरीज इलाज के लिए आते हैं।
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युवा मरीजों की संख्या: कुल मरीजों में से लगभग आधे (50%) मरीज 45 वर्ष से कम उम्र के होते हैं।
दैनिक आंकड़ा: रोजाना आने वाले 50 नए और 150 पुराने मरीजों में से करीब 10 मरीज ऐसे होते हैं जिनकी उम्र 40 साल से भी कम होती है।
तनाव और खराब खानपान से बढ़ रहा हार्ट अटैक का जोखिम
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समस्या के पीछे मुख्य कारण खराब जीवनशैली है:
तनाव और निष्क्रियता: लगातार मानसिक तनाव और शारीरिक व्यायाम की कमी।
स्क्रीन टाइम व खानपान: लंबे समय तक कंप्यूटर या मोबाइल स्क्रीन पर रहना और बाहर के असंतुलित खानपान का सेवन।
अतिरिक्त जोखिम: हाइपरटेंशन (ब्लड प्रेशर) और डायबिटीज से पीड़ित युवाओं में यह खतरा कई गुना अधिक हो जाता है।
डॉक्टरों ने युवाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच कराने और जरूरत पड़ने पर समय पर दवाएं लेने की सलाह दी है।
बच्चों में जन्मजात हृदय रोग: समय पर इलाज बेहद जरूरी
उधर, संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) के कार्डियोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. नवीन गर्ग ने बताया कि बच्चों में जन्मजात हृदय रोग (Congenital Heart Disease) के मामले वयस्कों से अलग होते हैं।
यूपी का आंकड़ा: उत्तर प्रदेश में हर साल करीब 40 हजार बच्चों में जन्मजात हृदय रोग की पहचान होती है।
आनुवांशिक कारण: इनमें से लगभग 5 प्रतिशत मामले आनुवांशिक (genetic) कारणों से होते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर पहचान और उपचार से बच्चों को गंभीर जटिलताओं और जानलेवा स्थिति से बचाया जा सकता है।












