मुख्य अंश (Highlights):
एसजीपीजीआईएमएस के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में ऑर्थोपेडिक्स विभाग ने की जटिल लिम्ब-सैल्वेज सर्जरी।
आयुष्मान भारत (PMJAY) योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर मरीज को मिला अत्याधुनिक इलाज
लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGIMS) के डॉक्टरों ने एक बार फिर चिकित्सा जगत में अपनी विशेषज्ञता का लोहा मनवाया है।
संस्थान के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर स्थित ऑर्थोपेडिक्स विभाग ने एक बुजुर्ग मरीज के हाथ को दुर्लभ और बेहद आक्रामक ‘जायंट सेल ट्यूमर’ (Giant Cell Tumor) से बचाने में बड़ी सफलता हासिल की है। यह जटिल और महंगी ‘लिम्ब-सैल्वेज सर्जरी’ आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत पूरी तरह मुफ्त की गई, जिसने मरीज को एक नई जिंदगी दी है।
क्या है यह ट्यूमर और क्यों था केस चुनौतीपूर्ण?
जायंट सेल ट्यूमर हड्डी का एक आक्रामक ट्यूमर है, जो आमतौर पर 20 से 40 वर्ष की आयु के युवाओं में पाया जाता है। बुजुर्ग मरीजों में इसका पाया जाना न सिर्फ दुर्लभ है, बल्कि इलाज के लिहाज से भी यह एक बड़ी चुनौती होता है। यह मरीज अपनी कलाई (डिस्टल रेडियस) में लगातार बढ़ते दर्द और सूजन से बेहाल था। यदि समय पर सही उपचार नहीं मिलता, तो हड्डी पूरी तरह नष्ट हो जाती और मरीज को हमेशा के लिए हाथ से हाथ धोना पड़ सकता था।
सर्जरी से पहले की गई विशेष ‘लक्षित’ तैयारी
सीधे ऑपरेशन करने के बजाय डॉक्टरों ने एक सुरक्षित रणनीति अपनाई। सर्जरी से पहले मरीज को ‘नियोएडजुवेंट डेनोसुमैब’ (Neoadjuvant Denosumab) दिया गया। इस आधुनिक थेरेपी ने ट्यूमर की जैविक गतिविधि को धीमा कर दिया और उसके आसपास नई हड्डी बनने में मदद की। इससे आसपास के सॉफ्ट टिश्यू को नुकसान पहुंचाए बिना ट्यूमर को बाहर निकालना काफी आसान हो गया।
पैर की हड्डी से कलाई का जटिल पुनर्निर्माण
दवाओं का सकारात्मक असर दिखने के बाद, सर्जनों ने ‘एन-ब्लॉक रिसेक्शन’ तकनीक के जरिए ट्यूमर को सुरक्षित मार्जिन के साथ पूरी तरह निकाल दिया। ट्यूमर निकलने के बाद कलाई में बनी हड्डी की बड़ी कमी को पूरा करने के लिए मरीज के ही पैर से फाइबुला हड्डी (ऑटोलॉगस फाइबुला ग्राफ्ट) ली गई और उसे कलाई में प्रत्यारोपित किया गया। इस जैविक पुनर्निर्माण ने हाथ कटने से बचाया और कलाई को उसकी खोई हुई स्थिरता वापस लौटा दी।
वरदान साबित हुई आयुष्मान भारत योजना
सर्जरी के बाद मरीज तेजी से रिकवर कर रहा है। फॉलो-अप जांच में ग्राफ्ट अपनी जगह अच्छे से सेट हो चुका है और ट्यूमर के वापस लौटने का कोई लक्षण नहीं है। अब मरीज अपने दैनिक काम खुद करने में पूरी तरह सक्षम है।
चिकित्सकों के अनुसार, इस सफलता का एक बड़ा श्रेय आयुष्मान भारत योजना को भी जाता है। इस योजना के बिना एक गरीब परिवार के लिए ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजी, जैविक उपचार और जटिल पुनर्निर्माण सर्जरी का खर्च उठाना असंभव था। एसजीपीजीआई का यह मामला साबित करता है कि उन्नत चिकित्सा तकनीक और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के सही तालमेल से किसी भी जरूरतमंद को विकलांगता से बचाकर सामान्य जीवन में लौटाया जा सकता है।











