लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGIMS), लखनऊ के एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग ने थायरॉयड के इलाज में एक क्रांतिकारी सफलता हासिल की है। प्रो. सबारेत्नम मयिलवगनन के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने ‘डायरेक्ट एक्सेस माइक्रोवेव एब्लेशन’ (DAMA) नामक एक नवीन हाइब्रिड शल्य तकनीक विकसित की है। यह तकनीक दोनों तरफ (बाइलेटरल) सौम्य (Benign) थायरॉयड नोड्यूल से पीड़ित मरीजों के लिए एक नया वरदान साबित होगी।
क्या है DAMA तकनीक और यह कैसे काम करती है?
परंपरागत रूप से दोनों ओर थायरॉयड नोड्यूल होने पर पूरा थायरॉयड (टोटल थायरॉयडेक्टॉमी) हटाना पड़ता था, जिससे मरीज को जीवनभर थायरॉक्सिन हार्मोन की दवाएं लेनी पड़ती थीं और तंत्रिका क्षति (RLN injury) जैसी जटिलताओं का जोखिम रहता था।
DAMA तकनीक में पारंपरिक सर्जरी और आधुनिक इमेज-गाइडेड थर्मल एब्लेशन का सटीक मेल किया गया है:
हेमिथायरॉयडेक्टॉमी: सर्जरी के दौरान थायरॉयड के मुख्य प्रभावित हिस्से को हटा दिया जाता है।
डायरेक्ट-एक्सेस एब्लेशन: दूसरी ओर मौजूद नोड्यूल को खुले शल्य क्षेत्र से ही माइक्रोवेव एब्लेशन द्वारा नष्ट कर दिया जाता है।
खुले सर्जिकल एक्सेस के कारण अल्ट्रासाउंड की मदद से माइक्रोवेव प्रोब को अत्यंत सटीकता से स्थापित किया जाता है, जिससे आसपास की नसों, श्वासनली (Trachea) और अन्ननली (Esophagus) को कोई नुकसान नहीं पहुँचता।
DAMA तकनीक के प्रमुख लाभ
अंग का संरक्षण (Organ Preservation): थायरॉयड का कार्यशील हिस्सा सुरक्षित रहता है, जिससे मरीज को जीवनभर हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी नहीं लेनी पड़ती।
सिंगल-स्टेज इलाज: दोनों तरफ के नोड्यूल्स का इलाज एक ही ऑपरेशन में संभव।
कम स्वास्थ्य व्यय: भविष्य में दोबारा सर्जरी की आवश्यकता कम होती है, जिससे मरीज का आर्थिक बोझ घटता है।
अधिक सुरक्षा: सामान्य पर्क्यूटेनियस एब्लेशन की तुलना में इसमें नसों और रक्त वाहिकाओं की सुरक्षा बेहतर होती है।
7 मरीजों पर सफल परीक्षण
एसजीपीजीआई में अब तक 7 चयनित मरीजों पर इस DAMA तकनीक का सफल परीक्षण किया जा चुका है।
सभी 7 प्रक्रियाएं 100% सफल रहीं।
किसी भी मरीज में कोई गंभीर जटिलता दर्ज नहीं की गई।
मरीजों का थायरॉयड फंक्शन सामान्य बना रहा और नोड्यूल्स के आकार में संतोषजनक कमी देखी गई।
नवाचार करने वाली विशेषज्ञ टीम
इस ऐतिहासिक उपलब्धि को अंजाम देने वाली बहु-विषयक (Multidisciplinary) टीम के प्रमुख अन्वेषक प्रो. सबारेत्नम मयिलवगनन हैं। उनके साथ इस नवाचार में डॉ. रजनी के. साह (सहायक प्रोफेसर), डॉ. जगन्नाथ स्पंदना और डॉ. नम्रता मस्कारा (रेज़िडेंट डॉक्टर्स) ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
यह तकनीक आधुनिक एंडोक्राइन सर्जरी के उस सपने को साकार करती है, जहाँ कम से कम चीर-फाड़ के साथ मरीज के अंग और उसकी प्राकृतिक कार्यप्रणाली को सुरक्षित रखा जा सके।











