लखनऊ। पेट की टीबी के केस लोगों में ज्यादा मिल रहे हैं। यह आंतों, पेट की आंतरिक लेयर या लसीका ग्रंथियों को चपेट में ले लेती है। पेट की टीबी का सही समय पर इलाज आवश्यक है। यह बात कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में सर्जरी विभाग प्रमुख डॉ. जीडी यादव ने मंगलवार को किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के जनरल सर्जरी विभाग के स्थापना दिवस समारोह से पूर्व सर्जिकल एजुकेशन प्रोग्राम को संबोधित करते हुए कहीं।
डॉ. यादव ने कहा कि पेट की टीबी के प्रमुख लक्षणों में मरीज का वजन तेजी से घटता है। मरीज को लगातार पेट दर्द, भूख न लगना, हल्का बुखार, उल्टी-दस्त, पेट में सूजन और कमजोरी जैसी शिकायत बनी रहती है। कई बार मरीज इन लक्षणों को सामान्य गैस या अपच समझकर नजरअंदाज कर घरेलू उपाय या बिना डॉक्टर के सलाह के दवा लेते रहते हैं।
टीबी कमजोर प्रतिरोधक क्षमता, कुपोषण और पहले से टीबी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहना जोखिम बढ़ाता है। रोकथाम के लिए पौष्टिक आहार, साफ-सफाई, खांसी-जुकाम के दौरान सावधानी बरते। बच्चों को लगने वाला बीसीजी टीका भी सुरक्षा प्रदान करता है। टीबी का इलाज बीच में छोड़ना मरीज के लिए जोखिम भरा हो सकता है। समय पर पहचान और पूरा इलाज पेट की टीबी कोठी कर सकता है।
प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉ. बृजेश मिश्रा ने बर्न इंजरी के इलाज पर जानकारी दी। ट्रॉमा सर्जरी विभाग प्रमुख डॉ. संदीप तिवारी ने चेस्ट व पेट में चोट के प्रबंधन पर अपडेट जानकारी दी। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुरेश कुमार ने चेस्ट के रोगों के इलाज पर जानकारी दी कि समय पर लक्षण पहचान कर कैसे इलाज किया जा सके। कार्यक्रम में डॉ. अक्षय आनंद, डॉ. शैलेंद्र यादव, पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. जेडी रावत मौजूद रहे।
आयोजन सचिव डॉ. गीतिका नंदा ने बताया कि कार्यक्रम में विभिन्न मेडिकल संस्थानों के करीब 140 डॉक्टर व छात्रों ने हिस्सा लिया।












