कक्षा 5 तक के बच्चों को मोबाइल पर होमवर्क देने पर रोक

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*महिला आयोग का बड़ा एक्शन

लखनऊ। गाजियाबाद में तीन बहनों के केस के बाद यूपी महिला आयोग ने बड़ा कदम उठाया है।

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आयोग अध्यक्ष डॉ.बबीता सिंह चौहान ने कक्षा 5 तक मोबाइल पर होमवर्क भेजने पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।
उन्होंने मोबाइल गेमिंग की लत को घातक बताते हुए जिलाधिकारियों को शैक्षणिक गतिविधियों पर नियंत्रण के पत्र लिखे हैं।

मोबाइल गेमिंग की लत आज के समय में एक गंभीर समस्या बन चुकी है। जब बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहते हैं, तो इसका असर न केवल उनके कोमल मस्तिष्क पर पड़ता है, बल्कि उनके भविष्य की संभावनाओं को भी धुंधला कर देता है।
​यहाँ इसके मुख्य मानसिक और करियर संबंधी प्रभावों का विवरण दिया गया है:
​1. मानसिक परेशानियां (Mental Issues)
​मोबाइल गेम्स बच्चों के दिमाग में ‘डोपामाइन’ (खुशी देने वाला हार्मोन) के स्तर को कृत्रिम रूप से बढ़ा देते हैं, जिससे उन्हें इसकी लत लग जाती है।
​चिड़चिड़ापन और गुस्सा: गेम हारने पर या मोबाइल छीन लिए जाने पर बच्चे अत्यधिक हिंसक और गुस्सैल व्यवहार करने लगते हैं।
​एकाग्रता की कमी (Lack of Focus): गेम्स की तेज गति के कारण बच्चों का दिमाग शांत चीजों (जैसे पढ़ाई) पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता। इससे उनकी ‘अटेंशन स्पैन’ कम हो जाती है।
​तनाव और अवसाद (Stress & Depression): वर्चुअल दुनिया में हारने या दोस्तों से पीछे रहने पर बच्चे अक्सर तनाव और अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं।
​नींद की समस्या: रात भर गेम खेलने से ‘मेलाटोनिन’ हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे अनिद्रा और थकान बनी रहती है।
​सामाजिक अलगाव: बच्चा बाहरी दुनिया और परिवार से कटकर अपनी एक काल्पनिक दुनिया में रहने लगता है, जिससे उसका सामाजिक विकास रुक जाता है।
​2. करियर पर प्रभाव (Impact on Career)
​करियर की नींव बचपन और किशोरावस्था की पढ़ाई और कौशल विकास पर टिकी होती है। गेमिंग एडिक्शन इस नींव को कमजोर कर देता है:
​शैक्षिक प्रदर्शन में गिरावट: पढ़ाई का समय गेमिंग में बीतने के कारण ग्रेड्स गिरते है।

​कौशल विकास में कमी (Skill Gap): करियर बनाने के लिए जरूरी सॉफ्ट स्किल्स जैसे—कम्युनिकेशन, टीम वर्क और प्रॉब्लम सॉल्विंग—मैदान में खेलने और लोगों से मिलने से आती हैं, जो मोबाइल गेमिंग में दब जाती हैं।
​लक्ष्य से भटकाव: बच्चे अक्सर वास्तविक जीवन की उपलब्धियों के बजाय गेम की ‘रैंक’ और ‘लेवल’ को ही अपनी सफलता मानने लगते हैं, जिससे वे भविष्य की योजनाओं के प्रति गंभीर नहीं रहते।
​रचनात्मकता का खत्म होना: खाली समय में कुछ नया सोचने या सीखने के बजाय बच्चे मोबाइल पर गेमिंग के अभ्यस्त हो जाते हैं, जिससे उनकी मौलिक सोच और क्रिएटिविटी प्रभावित होती है।

कई ऑनलाइन गेम्स में जुए और पैसे लगाने की लत लग जाती है, जो भविष्य में वित्तीय संकट और आपराधिक प्रवृत्तियों की ओर ले जा सकती है।
​विशेषज्ञों की राय: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ को एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति के रूप में मान्यता दी है। यदि बच्चा दिन में 3-4 घंटे से ज्यादा गेमिंग कर रहा है और इसे छोड़ने पर असामान्य व्यवहार कर रहा है, तो उसे पेशेवर परामर्श (Counseling) की आवश्यकता हो सकती है।

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