जरूरी नहीं एमआरआई हो, अल्ट्रासाउंड तकनीक भी है कारगर

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लखनऊ। गोमती नगर के डा. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में रेडियोडायग्नोसिस विभाग ने सोल्डर की इमेजिंग तकनीक पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में मस्कुलोस्केलेटल सोसायटी आफ इंडिया के विशेषज्ञों के तहत अल्ट्रासाउंड व एमआरआइ तकनीक से इलाज की जानकारी दी। इसमें रेडियोडायग्नोसिस, एनॉटामी तथा आर्थोपैडिक विभाग के विशेषज्ञों ने भी भाग लिया। कार्यशाला का उद्घाटन संस्थान के निदेशक डा. एके त्रिपाठी ने किया।
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए निदेशक डा. त्रिपाठी ने कहा कि किसी भी डिजीज के इलाज में तकनीक व दवाएं अपडेट होती रहती है। इसकी जानकारी होने से मरीज के इलाज में मदद मिलती है।

कार्यशाला में रेडियोडाइग्नोसिस के डा. शमरेद्र नारंग ने बताया कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने नियमों ने चिकित्सा शिक्षा के कुछ नियमों में बदलाव किये है। इसमें वर्टिकल इंट्रीगेशन के तहत पहली बार लोंिहया संस्थान में तकनीक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें पूरे देश के 40 प्रतिनिधि भाग ले रहे है आैर विभिन्न चिकित्सा संस्थानों से आये विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीक पर प्रशिक्षण दिया। इसके तहत एमबीबीएस अध्ययन करने वाले मेडिकोज को प्रत्येक ही डिजीज की जानकारी देना चाहिए। चाहे वह डाइग्नोसिस, पैथालॉजी व अन्य क्षेत्र का हो।

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उन्होंने बताया कि अगर देखा जाए तो जांच में अल्ट्रासाउंड, एमआरआई तथा एक्सरें में विशेषज्ञ डाक्टर को जांच कराने में यह तय करना होता है कि मरीज को कौन सी जांच करायी जाए ताकि बेहतर परिणाम आये। उन्होंने बताया कि सोल्डर पेन हाइरिवेल्यूशन जांच से पता चल सकता है, मांसपेशियां की इंजरी कहां हुई आैर कैसे ठीक होगी। इसके सर्जरी के बाद भी जांच करके अांतरिक स्थिति देखी जा सकती है। अल्ट्रासाउंड तकनीक में कलाई, घुटना सहित अन्य अंगों की जांच की जा सकती है।

उन्होंने बताया कि अल्ट्रासाउंड में इलास्टोग्राफी तकनीक आज कल बेहद चलन में है। इस तकनीक से जांच करने पर मांसपेशियां की कमजोरी की स्थिति का पता जाता है। पीजीआई चंडीगढ़ के डा. महेश ने बताया कि अल्ट्रासाउंड की तकनीक से जांच कई जटिल बीमारियों में कारगर है। इसकी खास बात यह भी है कि अल्ट्रासाउंड तकनीक से जांच करके दर्द का सटीक इंजेक्शन भी लगाया जा सकता है।

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