लखनऊ । सिर में लंबे समय से दर्द बना रहता है आैर उल्टियां भी आ रही हैं। यही नही जांच में आंख की रोशनी कम हो रही है साथ में चिड़चिड़ापन हो। उम्ररदराज लोगों में एकाग्रता में कमी लग रही तो संजीदा हो जाये। ये लक्षण दिमागी टीबी के हो सकते हैं। फौरन न्यूरोलाजिस्ट की परामर्श लेकर एमआरआई, रीढ़ की हड्डी के पानी (सीएफएस ) की जांच कराये।
पीजीआई में टीबीएम पर आयोजित अधिवेशन में शुक्रवार को न्यूरोलाजी विभाग के प्रमुख डॉ. सुनील प्रधान ने दी। उन्होंने कहा कि टीबी का सही समय पर पता चलना बहुत जरूरी है। दवा शुरू होने पर एक भी दिन दवा का नागा नहीं होना चाहिए। अमूमन मरीज आराम मिलने पर दवा का सेवन बंद कर देते हैं। जिससे समस्या बढ़ जाती है।
कार्यक्रम के आयोजक न्यूरोलॉजी विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ.यूके मिश्रा ने बताया कि सही समय पर एटीटी( एंटी ट्यूबर कुलर ट्रीटमेंट) देने से ऐसे मरीजों को काफी हद तक बचाया जा सकता है। वर्कशॉप में देश विदेश से आये डॉक्टरों ने टीबी की नवीन तकनीक से जांच और बेहतर इलाज पर चर्च की। वर्कशॉप का शुभारंभ पीजीआई निदेशक डॉ. राकेश कपूर ने किया।
टीबी के 300 मरीजों में से एक में टीबीएम की आशंका : शुरुआत में टीबी का इलाज न होने पर तीन सौ लोगों में से एक में टीबीएम की आशंका रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी का बैक्टीरिया का संक्रमण फेफड़े से रक्त प्रवाह के जरिए ही दिमाग में जाता है। संक्रमण होते ही टीबी की दवा चलने पर टीबीएम की आशंका कम हो जाती है।
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