लखनऊ। इंटरनेट का ज्यादा प्रयोग करना व उसी पर ज्यादातर समय लगे रहना, इसको भी डब्ल्यू एचओ ने मानसिक बीमारी का दर्जा दे दिया है। इसके लिए भी मानसिक रोग विशेषज्ञ से परामर्श करके इलाज कराया जा सकते है। यह जानकारी ड्यूक विश्वविद्यालय डरहम यूएस के मनोचिकित्सक डॉ अश्विन ए पाटकर ने इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी का 71वां वार्षिक सम्मेलन में दी।
उन्होंने बताया कि नशा एक आदत नहीं है बल्कि यह सामाजिक जीवन से जुड़ा है। टीवी, इंटरनेट आदि पर नशे का इस तरह से दिखाया लगता है कि नशा करना एक आम चीज है। इसे हमारे समाज की स्वीकृति मिली हुई है। नशे के साथ अगर डिप्रेशन, एन्जाइटी आदि जुड़ा होता है तो यह और गंभीर हो जाता है। काफी संख्या में लोग इस पर ध्यान नहीं देते है।
निमहेंस बेंगलुरु के डॉ. विवेक बेनेगल मानसिक स्वास्थ्य पर सरकार ज्यादा ध्यान नहीं देती है। कुल स्वास्थ्य बजट का केवल 0.6 प्रतिशत ही मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। बाकि अन्य एचआइवी, टीबी और वेक्टर बोर्न डिजीज आदि पर खर्च किया जाता है जबकि एक साल में मानसिक रोग का दुष्प्रभाव किसी भी देश पर एक ट्र्रिलयन का आर्थिक बोझ डालता है।
डॉ.बेनेगल ने बताया कि मानसिक रोग से केवल व्यक्ति का ही नहीं बल्कि परिवार, समाज और देश की उत्पादकता पर बहुत बड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है। आज तक हमारे यहां मेंटल हेल्थ का कोई बीमा नहीं है। बजट की दृष्टि से भारत, बांग्लादेश, नेपाल से भी नीचे है। सरकार ने मेंटल हेल्थ के लिए बीमे की व्यवस्था की थी, लेकिन वो सफल नहीं हो पाया।
मिशिगन विश्वविद्यालय से प्रसिद्ध अमेरिकी मनोचिकित्सक डॉ ब्रायन मार्टिस ने पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर पर अपना व्याख्यान दिया। यह एक विकार है जो भयानक घटनाओं से उबरने में विफलता के कारण होता है। अक्सर यह विकार युद्ध से लौटे सैनिकों में देखा जा सकता है। इनके लिए ट्रीटमेंट की व्यवस्था भी जाती है। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ.आलोक एन घनाटे ने इंटरनेट डीएडीक्शन के बारे में बात की।
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