हिन्दी या “हिंग्लिश” भी बना सकती है डॉक्टर

0
671

न्यूज डेस्क। डाक्टर बनने के लिए अब अग्रेजी आना कोई जरूरी नही है। हिन्दी या हिंग्लिश भी डाक्टर बना सकती हंै। मध्यप्रदेश में चिकित्सा पाठ्यक्रमों की परीक्षाओं के दौरान करीब 40,000 छात्रों के लिये भाषा अब कोई बाधा नहीं रह गयी है। यहां पर हिन्दी में पर्चा देकर भी एमबीबीएस आैर अन्य पाठ्यक्रमों की प्रतिष्ठित डिग्री हासिल की जा सकती है।
यह सुविधा मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के इसी वर्ष से लागू अहम फैसले से मुमकिन हो सकी है। फैसले के बाद हिन्दी पट्टी के इस प्रमुख राज्य में एमबीबीएस के अलावा नर्सिंग, डेंटल, यूनानी, योग, नेचुरोपैथी आैर अन्य चिकित्सा संकायों के पाठ्यक्रमों की परीक्षाएं हिन्दी में दिये जाने का सिलसिला शुरू हुआ है।

जबलपुंर स्थित विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. रविशंकर शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि परीक्षाओं के दौरान हमारे लिये यह जांचना जरूरी होता है कि किसी विद्यार्थी को संबंधित विषय का ज्ञान है या नहीं। इस सिलसिले में भाषा की कोई बाधा नहीं होनी चाहिये। यही सोचकर हमने अपने सभी पाठ्यक्रमों की परीक्षाओं में अंग्रेजी के विकल्प के रूप में हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी के इस्तेमाल को अनुमति देने का फैसला किया है।”

उन्होंने बताया कि इस साल सूबे के 10 चिकित्सा महाविद्यालयों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब एमबीबीएस पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों को हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी में परीक्षा देने की आजादी मिली। इस बार एमबीबीएस प्रथम वर्ष पाठ्यक्रम के कुल 1,228 में से 380 विद्यार्थियों यानी लगभग 31 प्रतिशत उम्मीदवारों ने हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी में परीक्षा दी है।

शर्मा ने कहा, “इस परीक्षा का नतीजा एकाध महीने में घोषित होने की उम्मीद है। हमें भरोसा है कि यह परिणाम गुजरे वर्षों की तुलना में बेहतर होगा क्योंकि इस बार परीक्षार्थियों को हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी में पर्चा देने का मददगार विकल्प भी मिला है।”

उन्होंने यह भी बताया कि मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के सभी पाठ्यक्रमों के करीब 40,000 विद्यार्थी केवल सैद्धांतिक परीक्षा ही नहीं, बल्कि प्रायोगिक आैर मौखिक परीक्षा (वाइवा) में भी हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी का इस्तेमाल कर सकते हैं।

बहरहाल, चिकित्सा पाठ्यक्रमों में हिन्दी में पढ़ाई की डगर विद्यार्थियों के लिये उतनी आसान भी नहीं है. खासकर एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिये हिन्दी की स्तरीय पुस्तकों का गंभीर अभाव है।
इंदौर के शासकीय महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय के सह-प्राध्यापक (एसोसिएट प्रोफेसर) डॉ. मनोहर भंडारी ने इस बात की पुष्टि की आैर कहा, “चिकित्सा पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों के लिये हिन्दी की अच्छी किताबें बेहद जरूरी हैं।”

अब PayTM के जरिए भी द एम्पल न्यूज़ की मदद कर सकते हैं. मोबाइल नंबर 9140014727 पर पेटीएम करें.
द एम्पल न्यूज़ डॉट कॉम को छोटी-सी सहयोग राशि देकर इसके संचालन में मदद करें: Rs 200 > Rs 500 > Rs 1000 > Rs 2000 > Rs 5000 > Rs 10000.

Previous articleडफरिन कैम्पस के आवास में लगी आग
Next article26 घंटे बाद ठीक हो पायी नयी सीटी स्कैन मशीन

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here