जापान के सहयोग से केजीएमयू में शुरू होगा यह जटिल प्रत्यारोपण

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लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में वर्तमान में फिलहाल किडनी और कार्डियक का प्रत्यारोपण भले ही अभी दूर की कौड़ी हो पर जापान के सहयोग से गुदा प्रत्यारोपण की कोशिश शुरू हो गई है. बहुत ही कम देशों में अभी तक ऐसे प्रत्यारोपण किए जाते हैं। इस प्रकार की सर्जरी में प्रत्यारोपण के लिए सुपर माइक्रो स्कोप से किया जाता है। यह काफी महंगी तकनीक है। मगर लखनऊ के केजीएमयू में जापान के सहयोग से प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को शुरु करने की कवायद की जा रही है। बुधवार को केजीएमयू में जापान के यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो के रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विभाग के डॉ़ जून अराकी ने एंट्रोपिलोरिक वॉल्व ट्रांसप्लांटेशन पर तकनीकी जानकारी दिया। केजीएमयू के डिपार्टमेंट ऑफ़ गैस्ट्रोएंट्रोलोजी की ओर से इस गोष्ठी का आयोजन किया गया.

केजीएमयू के डिपार्टमेंट ऑफ़ गैस्ट्रोएंट्रोलोजी के हेड डॉ़ अभिजीत चंद्रा ने बताया कि डॉ़ जुन केजीएमयू में चल रही चिकित्सकीय पद्धति का अध्ययन कर रहे हैं। अपने संबोधन में उन्होंने जापान में हो रहे प्रत्यारोण की जानकारी दी. डॉ. जुन अराकी ने बतया कि सुपर माइक्रोस्कोप एनोरेक्टल प्रत्यारोपण किया जा सकता है। इसके साथ ही हाथ, पैर और बच्चेदानी सहित जटिल प्रत्यारोण को भी इससे आसानी से किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इन अंगाें का प्रत्यारोण करने के दौरान कई चीजें काफी महीन होती हैं जो सामान्य मशीन से नहीं दिखाई देते हैं। उन्हें जोड़ना बहुत जरूरी होता है . सुपर माइक्रो स्कोप से छोटी से छोटी मांसपेशियां तथा रक्त वाहिकाएं तक को भी आसानी से देखा जा सकता है।

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प्रत्यारोण के दाैरान महीन रक्त को जोड़ने में इस स्कोप से काफी मदद होती है। डॉ़ अभिजीत ने बताया कि सुपर माइक्रो स्कोप की मदद से 0.4 मिलीमीटर की नलिका को भी सौ गुना बड़े आकार में देख सकते हैं। जिससे उसकी सर्जरी काफी आसान हो जाती है। यह उपकरण काफी महंगी है, इस कारण दुनिया के चुनिंदा मेडिकल इंस्टिट्यूशन में यह है।

डॉ अभिजीत चंद्रा ने बताया कि कई बार एक्सीडेंट में या कैंसर के मामले में शरीर में मल निकासी का रास्ता खराब हो जाता है। वहीं ऐसी समस्याएं महिलाओं को बच्चेदानी में भी आ जाती है। जिसको केजीएमयू में एनल रिकंस्ट्रक्शन के द्वारा ठीक किया जाता है। इसमें पेट में पाइलोरस (अमाशय का निचला द्वार) को एनल कैनाल को नीचे से जोड़ देते हैं। जबकि प्रत्यारोण के दौरान इसमें कैडेवर से निकाले गए अंग को लगाते हैं। डॉ अभिजीत ने बताया कि केजीएमयू में अभी तक 22 मरीजों का इस तरह से इलाज किया जा चुका है। जिसमें से बीस मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं। केजीएमयू में हुई इस सर्जरी को अमेरिकन सोसायटी ऑफ कोलन रेक्टल में साल 2016 में प्रकाशित किया जा चुका है.

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