लखनऊ। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा २०११ में जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार ७.२ करोड़ भारतीय दुर्लभ बीमारियों से ग्रसित हैं। उन्हीं में से एक बीमारी आइडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस (आईपीएफ) जो भारत में तेजी से बढ़ रहा है। यह एक क्रानिक बीमारी है जो आगे चलकर जानलेवा साबित होती है। इस बीमारी को फेफड़ों के कार्यप्रणाली में धीरे-धीरे होने वाली गिरावट के रूप में जाना जाता है। यह जानकारी केजीएमयू के पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष और इंण्डियन चेस्ट सोसाइटी के अध्यक्ष प्रो.सूर्यकांत त्रिपाठी ने पत्रकार वार्ता के दौरान साझा की ।
उन्होंने बताया कि भारत में लगातार आईपीएफ के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यदि समय रहते मरीज विशेषज्ञ चिकित्सकों के पास पहुंच जाये तो इस बीमारी का इलाज संभव है। डॉ. सूर्यकांत की माने तो बीमारी के शुरूआती दौर यानि एक वर्ष के भीतर यदि मरीज चिकित्सक के पास पहुंच जाये तो उसे बचाया जा सकता है,नहीं तो इस बीमारी के होने के बाद मरीज की जिंदगी महज ३ वर्ष ही रह जाती है।
प्रो.सूर्यकांत के मुताबिक आइडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस फेंफड़े की बीमारी का एक प्रकार है। जिसके चलते फेंफड़े खराब हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि बीते ५ सालों में इस बीमारी से पीडि़त मरीजों की संख्या में ५० प्रतिशत की वृद्घि हुयी है। उन्होंने बताया कि महिलाओं की तुलना में पुरूषों को यह बीमारी अधिक होती है। इसका मुख्य कारण धूम्रपान तथा पर्यावरण का दूषित होना पाया गया है। इस बीमारी में अलग-अलग लोगों में लक्षण भी अलग पाये जाते हैं।
उन्होंने बताया कि इंण्डियन चेस्ट सोसाइटी द्वारा २०१७ में किये गये एक शोध में भारत में इस बीमारी से १०८४ लोग ग्रसित पाये गये। जो दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा कम है,लेकिन यहां पर बीमारी का पता देर से चलने के कारण ज्यादातर मरीजों को अपनी जान गंवानी पड़ती है।
लक्षण-
१.जल्दी-जल्दी और कम गहरी सांस लेना
२.थकान और ऊर्जा में कमी
३.क्रॉनिक कफ
४.सीने में दर्द या जकडऩ महसूस होना
५. वजन में अचानक गिरावट आना
६. भूख मेें कमी
७. उंगलियों के आकार में बदलाव,जिसे क्लबिंग कहते हैं
८. मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द










