लखनऊ। ब्लड कैंसर कोशिकाओं में उत्पवरिवर्तन के कारण शुरू होता है, जो कि खून या अस्थि मज्जा (बोन मैरो) में होता है। यह खून में धीरे-धीरे फैलता है। रक्त कैंसर की ये कोशिकाएं समाप्त नहीं होती हैं, बल्कि और गंभीर हो जाती हैं। रक्त कैंसर के तीन प्रमुख रूप होते हैं जिसे ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और मल्टीपल मायलोमा। रक्त कैंसर किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन 30 साल के बाद रक्त कैंसर होने का खतरा ज्यादा होता है। ब्लड कैंसर होने पर हड्डियों और जोडों में दर्द होने लगता है।
बुखार आना, चक्कार आना, बार-बार संक्रमण, रात को पसीना और वजन कम होना रक्त कैंसर के प्रमुख लक्षण हैं। यह जानकारी शनिवार को संजय गांधी पीजीआई में यंग हिमैटोलाजिस्ट मीट में विशेषज्ञों ने दी। सभी ने एक मत से कहा कि सही बीमारी का पकड़ और इलाज से कैंसर ठीक हो जाता है। मीट में विभाग की प्रमुख प्रो. सोनिया नित्याननंद. प्रो. राजेश कश्यप, प्रो. अंशुल श्रीवास्तव और प्रो. संजीव , टीएमसी कोलक्ता के टी जेनिसान, पीजीआई चंडीगढ़ के प्रो. दीपक बंसल, प्रो.पंकज मेहरोत्रा, डा. गौरव प्रकाश सहित अन्य विशेषज्ञों मौजूद थे। इस मीट में नए हिमैटोलजिस्टों को इलाज की तकनीक के बारे में जानकारी दी ।
मीट में प्रो. राजेश कश्यप ने कहा कि ल्यूकीमिया चार प्रकार के होते हैं एक्यूट लिम्फोसाईटिक ल्यूकीमिया, क्रोनिक लिम्फोसाईटिक ल्यूकीमिया, एक्यूट माइलोसाईटिक ल्यूकीमिया और क्रोनिक माइलोसाईटिक ल्यूकीमिया। इलाज उसके प्रकार पर निर्भर करता है। इलाज में कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, बॉयोलॉजिकल थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट थेरेपी का प्रयोग किया जाता है।
विशेषज्ञों ने एक मत से कहा कि जब बीमारी काफी जटिल हो जाती है, तो स्टेम सेल ट्रांसप्लांट ही आखिरी उम्मीद होती है। ओटोलोगस स्टेम सेल ट्रांसप्लांट इसमें रोगी के अस्थि मज्जा से ही स्टेम सेल निकाल कर ही उसको ट्रांसप्लांट करते हैं। एलोजेनिक बोन मेरो ट्रांसप्लांट में किसी अन्य व्यक्ति के स्वस्थ सेल्स मिला करके रोगी के क्षतिग्रस्त सेल्स से स्थानांतरित कर देते हैं। इसके लिए रोगी के परिवार वालों में से ही किसी व्यक्ति को चुना जाता है क्योंकि उनके सेल्स रोगी के सेल्स से मिलते हुए होते हैं। एलोजेनिक डोनर सेल्स रोगी को ल्यूकीमिया सेल्स से लड़ने में मदद करते हैं।
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