लखनऊ। 39 वां स्टेट कांफ्रेंस ऑफ इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के पहले दिन आज तीन कार्यशाला राजधानी के विभिन्न मेडिकल संस्थानों में हुई। तीनों कार्यशाला में शिशु के बचपन से लेकर किशोरावस्था तक होने वाली परेशानियों तथा बीमारियों के इलाज पर चर्चा की गयी। किं ग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कलाम सेंटर में पहली कार्यशाला का आयोजन किया गया। यहां पर नियोनेटल केयर पर विशेषज्ञों ने जानकारी दी। डा. सुषमा नागिया ने कहा कि नियोनेटल वेंटिलेशन में तकनीक चूक से शिशु के दिमाग पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि नियोनेटल के लिए डाक्टरों को प्रशिक्षण दिया जाना चांिहए। इस लिए योजना के तहत प्रशिक्षण दिये जाने की आवश्यकता है।
डॉ आशुतोष वर्मा ने बताया कि आज पहले दिन प्रदेश के जितने भी बालरोग विशेषज्ञ है उनको वेंटिलेशन और कृत्रिम स्वास के द्वारा किस तरीके से नवजात शिशुओं के मृत्यु कम की जा सकती है, कार्यशाला में प्रो .माला कुमार और डॉ एस.एन सिंह के नेतृत्व में हुई है। कार्यशाला में डॉ सुषमा नागिया ने बताया कि कुछ बच्चों में स्वाश की दिक्कत होती है जैसे स्वास उनकी बहुत तेज चल रही होती है तो कभी बहुत धीमे, ऐसे बच्चों को वेंटिलेटर के द्वारा कृत्रिम स्वास दी जाती है। वेंटिलेटर लगते समय कई तकनीकी पहलू होते हंै। कितने देर बच्चें को वेन्टीलेट करना है आैर किन पर ध्यान रखना है। चीजें की कार्यशाला में नवजात विषेशज्ञों को सिखाई व बताई गयी है।
इसके अलावा दूसरी कार्यशाला “क्रेडल टू क्रेयान” जिसके अंतर्गत बाल रोग विशेषज्ञों को यह सिखाने का प्रयास किया है, जिन बच्चों में पैदाइशी विकृतियां है या जिनके बढ़ने में कुछ दिक्कतें है उन्हें किस तरह से हम आगे ले जाया जाये. यह कार्यशाला डॉ अनुराग कटियार के नेतृत्व में की गयी। इसी तरह तीसरी कार्यशाला जो कलाम सेंटर में आयोजित हो रही है उसका नाम है “ऐडोलेशन वर्कशाप”. इस वर्कशाप में 10 से 18 साल तक की उम्र के बच्चों में रही समस्यों में बाल रोग विशेषज्ञ किस तरह से इलाज करे.ं उसके बारें में डॉक्टर्स को सिखाया और समझाया गया है।
चौथी वर्कशॉप डिवाइन हॉस्पिटल में हुई है, जिसमे बच्चों नवजात बच्चों के हार्ट में आ रही समस्यों व उनके इलाज के विषय में आयी हुई नई टेक्नालॉजी के विषय में बाल रोग विशेषज्ञों को सिखाया व समझाया गया है। पांचवी वर्कशॉप विवेकानंद पॉलिक्लिनिक में शिशुओं के गुर्दा रोग से सम्बंधित हुई है। बालरोग विशेषज्ञ डॉ. प्याली भट्ट्चार्या ने कहा कि किशोरों की सबसे बड़ी समस्या है अपनी बातों को एक्सप्रेस न कर पाना है. उन्होंने कहा कि इस तरह के लोगों के साथ काम कर पाना सबसे मुश्किल होता है क्योकि पहली बात तो ऐसे लोग हमारे पास जल्दी आते नहीं है क्योकि वो स्कूल या स्पोर्ट्स की एक्टिविटी में मशगूल होते है।
शोध में जो तीन अक्सर बच्चें आकर ये शिकायत करते है कि हमने मम्मी से बात करने की कोशिश की यानि माँ के पास बच्चे के लिए समय नहीं है क्योकि वो दो जगह अपने काम को बाँट रही है पहला आफिस में दूसरा घर में लिहाजा बच्चें के लिए उसके पास समय नहीं है। बच्चें को 9 मिनट कम से कम बच्चें को माँ-बाप से मिलना चाहिए. पहले तीन मिनट उसे तब मिलने चाहिए जब वो सुबह सो कर उठे, और दूसरा तीन मिनट तब जब वो स्कूल से घर आयें और अंतिम तीन मिनट उसे तब मिले जब वो रात में सोने जाएँ। आज हमारे सामाजिक परिवेश में लोरी, कटोरी और स्टोरी तीन चीजें गायब हो चुकी है। जबकि बच्चें के व्यवहार को बनाने में इन्ही चीजों का में रोल होता है. आज के दौर में बच्चें इंटरनेट से मशगूल है।
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