देश का पहला पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन प्रशिक्षण केंद्र स्थापित होगा Kgmu में: डॉ. सूर्यकान्त

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*रेस्पिवॉक कॉन्फ्रेंस में चार कार्यशालाओं का हुआ सफल आयोजन*

 

*रोगों से निपटने के लिए प्रशिक्षण और नई तकनीकों का उपयोग आवश्यकः डॉ. सोनिया नित्यानन्द, कुलपति

 

 

 

 

 

 

लखनऊ।kgmu में रेस्पिवॉक कॉन्फ्रेंस का शनिवार को शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि देशभर के विभिन्न एम्स एवं चिकित्सा संस्थानों से लगभग 300 पल्मोनोलॉजिस्ट, जनरल फिजिशियन, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ, पीजी रेजिडेंट्स एवं फिजियोथेरेपिस्ट ने प्रतिभाग कर कॉन्फ्रेंस को सफल बनाया।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

डॉ. सोनिया नित्यानन्द ने कहा कि प्रभावी रोग नियंत्रण के लिए चिकित्सकों को सतत प्रशिक्षण और अद्यतन ज्ञान से लैस रहना चाहिए। रोगों से निपटने के लिए प्रशिक्षण और नई तकनीकों का उपयोग अत्यंत आवश्यक है।

चार वर्कशॉप आयोजित की गईं, इनमें से दो वर्कशॉप रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में आयोजित की गईं। पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन वर्कशॉप का आयोजन विभाग से डॉ. संतोष कुमार एवं एस.एन. मेडिकल कॉलेज, आगरा से डॉ. गजेंद्र विक्रम सिंह के निर्देशन में सम्पन्न हुआ ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इसके साथ ही वर्कशॉप के दौरान प्रतिभागियों को हैंड्स-ऑन सत्रों के माध्यम से 6 मिनट वॉक टेस्ट, श्वास संबंधी व्यायाम, एयरवे क्लीयरेंस तकनीक, मसल ट्रेनिंग तथा पोषण संबंधी परामर्श का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। विभाग का पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन सेंटर उत्तर प्रदेश का पहला ऐसा केंद्र है, जहाँ अब तक लगभग 3000 श्वसन रोगियों को पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन की सुविधा निःशुल्क प्रदान की गई है। पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन के  डॉ. सूर्यकान्त एवं सह-प्रभारी डॉ. अंकित कुमार ने बताया कि इस वर्कशॉप के प्रतिभागियों की विशेष मांग पर देश का पहला पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया जाएगा, जहाँ देश भर के श्वसन रोग विशेषज्ञों व फिजियोथेरेपिस्ट को प्रशिक्षण दिया जाएगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि दो वर्कशॉप रेस्पिवॉक कॉन्फ्रेंस के अंतर्गत उनके नेतृत्व में लोहिया संस्थान में आयोजित की गईं। जिसका आयोजन आरएमएल के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार वर्मा एवं संजीवनी हॉस्पिटल से डॉ. एस.एन. गुप्ता द्वारा इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (आईएलडी) वर्कशॉप के रूप में किया गया। इसमें रेडियोलॉजिकल इंटरप्रिटेशन, रुमेटोलॉजिकल रोगों से संबंधित आईएलडी तथा रोग के विभिन्न फेनोटाइप्स पर प्रशिक्षण दिया गया।

 

 

 

 

 

 

आईएलडी को नॉन-आईपीएफ और इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस (आईपीएफ) में बांटा जाता है। आईपीएफ में बिना कारण फेफड़ों में सिकुड़न आ जाती है, जिससे कार्यक्षमता घटती है। शुरुआत सूखी खांसी से होती है, बाद में सांस फूलने लगती है और गंभीर अवस्था में फेफड़े “हनीकॉम्ब” जैसे दिखते हैं।

 

डा सूर्यकान्त ने बताया कि देश में 40 प्रतिशत पुरूष, 20 प्रतिशत महिलाए व 10 प्रतिशत बच्चे खर्राटे लेते हैं और लगभग 10 कारोड़ लोग ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया के शिकार हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

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