न्यूज। ”माघ मकर गति रवि जब होई, तीरथ पतिहिं आव सब कोई, के पुण्य आवाहन के साथ माघ मेले में ”पौष पूर्णिमा”” के पावन स्नान के साथ ही संयम, अहिंसा, श्रद्धा एवं कायाशोधन के लिए तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की रेती पर कल्पवासियों का एक माह का कल्पवास शुरू हो गया।
पुराणों और धर्मशासों में कल्पवास को आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए जरूरी बताया गया है। यह मनुष्य के लिए अध्यात्म की राह का एक पड़ाव है, जिसके जरिए स्वनियंत्रण एवं आत्मशुद्धि का प्रयास किया जाता है। हर वर्ष श्रद्धालु एक महीने तक संगम गंगा तट पर अल्पाहार, स्नान, ध्यान एवं दान करके कल्पवास करते हैं।
वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केन्द्र के आचार्य डा आत्माराम गौतम ने ”यूनीवार्ता”” से कहा कि तीर्थराज प्रयाग में प्रतिवर्ष माघ महीने मे विशाल मेला लगता है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहाँ एक महीने तक संगम तट पर निवास करते हुए जप, तप, ध्यान, साधना, यज्ञ एवं दान आदि विविध प्रकार के धार्मिक कृत्य करते हैं। इसी को कल्पवास कहा जाता है। कल्पवास का वास्तविक अर्थ है-कायाकल्प। यह कायाकल्प शरीर और अन्त:करण दोनों का होना चाहिए। इसी कायाकल्प के लिए पविा संगम तट पर जो एक महीने का वास किया जाता है उसे कल्पवास कहा जाता है।
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