निर्जला एकादशी 25 जून को: रवि, शिव और सिद्ध योग के महासंयोग में बरसेगी श्रीहरि की

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​तिथि: 25 जून को उदया तिथि के अनुसार रखा जाएगा व्रत।
​महासंयोग: गुरुवार के दिन रवि, शिव और सिद्ध योग का बन रहा है दुर्लभ संयोग।
​महत्व: साल की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य देता है यह एक व्रत।

​लखनऊ। भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने और आध्यात्मिक उन्नति का पावन पर्व ‘निर्जला एकादशी’ इस वर्ष 25 जून को मनाया जाएगा। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस बार का यह व्रत कई मायनों में बेहद खास और अत्यंत फलदायी माना जा रहा है।

​शुभ मुहूर्त और उदया तिथि
​ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल (स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र, अलीगंज, लखनऊ) के अनुसार, एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जून को सायंकाल 8 बजकर 12 मिनट से होगी, जो 25 जून को रात 8 बजकर 09 मिनट तक रहेगी। सनातन धर्म में उदया तिथि की मान्यता के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून को ही रखा जाएगा।

​गुरु पुष्य और तीन शुभ योगों का महासंयोग
​इस वर्ष निर्जला एकादशी गुरुवार के दिन पड़ रही है, जिससे इसका महत्व कई गुना बढ़ गया है क्योंकि गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इसके साथ ही इस दिन रवि योग, शिव योग और सिद्ध योग का त्रिवेणी संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इन योगों को बेहद शुभ और कल्याणकारी माना गया है। इस शुभ घड़ी में की गई पूजा-पाठ, मंत्र जाप, दान और माता लक्ष्मी सहित भगवान विष्णु की आराधना से भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

​क्यों कहा जाता है ‘भीमसेनी एकादशी’?
​पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडव पुत्र भीमसेन के लिए हर महीने आने वाली सभी एकादशियों का व्रत रख पाना (भूखे रहना) असंभव था। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें वर्ष में केवल एक बार आने वाली ‘निर्जला एकादशी’ का पूर्ण विधि-विधान से व्रत करने की सलाह दी थी। इसी कारण इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है।

​एक व्रत से मिलेगा सालभर की एकादशियों का पुण्य
​धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत बिना अन्न और जल ग्रहण किए रखा जाता है। जो श्रद्धालु पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाते हैं, वे यदि केवल इस एक एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा से रख लें, तो उन्हें सालभर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है और उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

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