लखनऊ – यूरिक एसिड लगातार बढ़े रहने से आर्थोराइटिस की चपेट में आ सकते हैं। देशी व लोगों के परामर्श के इलाज से बचते हुए विशेषज्ञ डाक्टर से जांच कर परामर्श लेना चाहिए। अगर आर्थोराइटिस की चपेट में पहुंच चुके है, तो कूल्ड रेडियो फ्रिक्वेंसी मशीन की मदद से नसों को बंद करके मरीज को होने वाले दर्द से निजात मिल सकती है। यह जानकारी शुक्रवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के एनेस्थीसिया क्रिटिकल केयर एवं पेन मेडिसिन विभाग द्वारा आयोजित इंडियन सोसाइटी ऑफ पेन-क्लीनिक 4वें राष्ट्रीय सम्मेलन (आईएसपीसी कॉन -2018) के पहले दिन मुम्बई से आये पेन स्पेशलिस्ट डॉ. सिद्धार्थ वर्मा ने दी। इसके अलावा सम्मेलन में कैंसर, ट्यूमर सहित अन्य दर्द से निजात दिलाने की तकनीक पर जानकारी दी गयी।
उन्होंने बताया कि यूरिक एसिड किसी का भी बढ़ सकता है। यही नहीं आर्थोराइटिस भी किसी को भी हो सकता है। उन्होंने बताया कि 35 साल के बाद अक्सर शरीर की नसों में खून का संचार भी धीमा होने लगता है। डॉ. सिद्धार्थ के अनुसार आर्थोराइटिस के मरीज बहुत देर से विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास पहुंचत पाते हैं। उन्होंने बताया कि हार्मोनल थेरेपी यानि पैराथोरमोन के नियमित एक साल के प्रयोग से उम्र की वजह से नसों को होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।
कोलकत्ता से आयी पेन स्पेशलिस्ट डॉ. दिव्यदीप मुखर्जी ने बताया कि ब्लड कैंसर और ट्यूमर के दर्द से परेशान बच्चों को ओरल मेडिसिन से आराम न मिलने पर मारफीन का इंजेक्शन दिया जा सकता है। मारफीन का इंजेक्शन काफी सस्ता है और इससे किसी तरह के नशे की लत मरीज को नहीं पड़ती।
मुम्बई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. आरपी गोदू ने बताया कि जिन कैंसर और न्यूरो सर्जरी के मरीजों को ऑपरेशन के बाद भी दर्द से राहत न मिलने पर स्पाइल काल्ड स्टीमुलेटर महंगा इंजेक्शन देते हैं। जिसके कारण यह इंजेक्शन आम लोग नही खरीद पाते है। डॉ. अनुराग अग्रवाल ने कहा कि लोगों में मोटापा बढ़ रहा है। इस वजह से घुटनों के जोड़ में मौजूद कॉर्टिलेज घिस जाती है। हड्डी आपस में टकराती तो दर्द महूसस होता है। दर्द से निजात पाने के लिए मरीज तमाम तरह की दवाएं खाते हैं। आखिर में डॉक्टर की सलाह पर घुटना प्रत्यारोपण तक कराना पड़ता है। उन्होंने बताया कि पेन बायोलॉजिकल थेरेपी (पीआरपी) से मरीज दवाएं खाने से बच सकते हैं। इसमें मरीज का खून लेते हैं। उससे प्लेटलेट्स रिच प्लॉजमा निकालते हैं। इससे इंजेक्शन के जरिए घुटनों के प्रत्यारोपित करते हैं। उन्होंने बताया कि सही समय पर इलाज से बीमारी पर काबू पाया जा सकता है।
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