लखनऊ। अस्थमा के मरीजों में फेफड़े में स्टेम सेल तकनीक के प्रयोग से बेहतर इलाज देखने को मिला है। इसका प्रयोग काफी देशों में हो रहा है, परंतु भारत में यह स्टेम सेल तकनीक नयी है और इसके यहां विस्तार में अभी वक्त लगेगा। यह जानकारी स्टेम सेल इण्डिया रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष और स्टेम सेल सोसाइटी ऑफ इंडिया के फाउंडर उप-अध्यक्ष डॉ बीएस राजपूत ने साइंटिफिक कन्वेन्शन सेंटर में चल रही एलर्जी और अस्थमा की 51वीं वार्षिक कार्यशाला में (आईसीसीएआईसीओएन) के अन्तिम दिन दी। कार्यशाला में विशेषज्ञों ने श्वसन सम्बधी बीमारियों पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि श्वसन सम्बंधी रोगों के उपचार में स्टेम सेल तकनीक का प्रयोग 4-5 सालों से हो रहा है। इंटरस्टीशीयल लँग डिजीज (आईएलडी) के रोगियों को स्टेम सेल तकनीक ने नया जीवनदान दिया है। इस स्टेम सेल तकनीक में रोगी के ही बोन मैरो के मीसन कायमल सेल का उपयोग करते हुए रोगी की प्रतिरोधक क्षमता में काफी सुधार होता है और शरीर के क्षतिग्रस्त हुए भाग को दोबारा से स्वस्थ होने का मौका मिलता है। बोन मैरो नूक्लीअर सेल कॉन्सेंट्रेट बनाया जाता है और फिल्टर करने के बाद उसे दोबारा से रोगी को चढ़ाया जाता है।
डॉ राजपूत ने बताया कि अस्थमा और इंटरस्टीशीयल लँग डिज़ीज़ (आईएलडी) दोनों रोग होने के कारण भिन्न हैं। इंटरस्टीशीयल लँग डिज़ीज़ (आईएलडी) के उपचार के लिए रक्त संचार बढ़ाया जाता है और फ़ायब्रोसिस को कम करना होता है, इसलिए बोन मैरो के मीसन कायमल सेल का इस्तेमाल होता है। ब्रांाकियल अस्थमा में भी स्टेम सेल के प्रयोग करने से मरीज की बीमारी ठीक होने के साथ ही फेफड़े भी स्वस्थ होते हैं। उन्होंने डाक्टरों से अपील की कि अस्थमा और इंटरस्टीशीयल लँग डिज़ीज़ (आईएलडी) के उपचार में स्टेम सेल तकनीक के उपयोग को बढ़ाए और रोगियों को लाभान्वित करें। उन्होंने कहा कि स्टेम सेल तकनीक महंगी विधि नहीं है क्योंकि इलाज के लिए ज़रूरी जैविक तत्व रोगी से ही लिए जाते हैं। कार्यशाला में पल्मोनरी मेडिसिन के प्रमुख डा. सूर्यकांत सहित अन्य वरिष्ठ डक्टर मौजूद थे।
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