अस्थमा में लापरवाही ले सकती है जान

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लखनऊ। अस्थमा सिर्फ एक सांस की बीमारी नहीं यदि लापरवाही बरती गयी तो क्रॉनिक होकर यह जान लेवा हो सकती है। जरूरी है कि समय से ही इसका इलाज किया जाए। शुरुआती दौर में चार बार तक अस्थमा वायरल ही माना होता है और 1-3 माह के इलाज में यह पूरी तरह से ठीक हो जाता है। मगर लापरवाही की गयी तो रोग कभी दूर नहीं होता। यह जानकारी डॉ. बीपी सिंह ने दी।

चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. बीपी सिंह ने निजी होटल में पत्रकार वार्ता करते हुए रोग से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं। इस दौरान बेरोक जिन्दगी नाम का एक कार्यक्रम भी लांच किया गया। डॉ. सिंह ने अस्थमा के इलाज के इनहेलर पर जोर देते हुए कहा कि यह सबसे बेहतर इलाज है। फेफड़े व सांस की नली में सूचना का होना ही अस्थमा है जिसके बाद मरीज सामान्य रूप से सांस नहीं ले पाता। इनहेलर के प्रयोग से वह सूजन कम होती है और आसानी से सांस ली जा सकती है। उन्होंने कहा कि यदि एक बार दवा शुरू करें तो कोर्स पूरा कर लें बीच में दवा छोडऩा काफी खतरनाक हो सकता है।

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय निरंजन ने बच्चों से जुड़ी अस्थमा की समस्या पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बच्चों में भी यह रोग तेजी से बढ़ा है जिसके लिए प्रदूषण तो जि मेदार है ही। साथ ही यह आनुवांशिक रोग भी है। उन्होंने बताया कि एक सर्वे में यह देखा गया कि लखनऊ में 14 वर्ष से कम उम्र के 8-10 प्रतिशत बच्चे अस्थमा से पीडि़त हैं। उन्होंने कहा कि हर साल देश में 1.87 लाख मौतें अस्थमा से होती है अत: यह एक खतरनाक रोग है जिसके लिए इलाज के लिए जागरुकता बहुत जरूरी है।

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