इसमें दिक्कत आने पर आता है चक्कर और खो जाता है बैंलेंस

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लखनऊ। चलने फिरने में अगर चक्कर आ रहे हो या बैलेंस बनाने में दिक्कत हो तो यह कान से संबंधित बीमारी हो सकती है। ज्यादातर लोग सही जानकारी न होने पर न्यूरो और नेत्र विभाग में इलाज करवाते हैं। इस बीमारी को बाइलेटरल वेस्टीबुलर लॉस कहते हैं। इसको दूर करने के लिए बेल्ट की तरह बंधी हवेस्टीबुलर असिस्टिव डिवाइस कारगर होगी। यह जानकारी नीरदलैंड की मैसट्रियल यूनिवर्सिटी के क्लीनिकल वेस्टीब्यूलॉजी विभाग के आईजी- नोबल प्राइज विनर डॉ.हरमेन किंगमा ने किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सेल्बी हॉल में आयोजित डॉ.आरएन मिश्रा मेमोरियल लेक्चर में दी।

डॉ.हरमेन ने बताया कि अक्सर बुजुर्ग लोगों को चलने-फिरने में तेज चक्कर आते हैं। सिर घूमने लगता है, चलते समय बैलेंस बनाने में भी दिक्कत आने लगती है। इस तरह के मरीज शुरुआती दौर में न्यूरोलॉजी या नेत्ररोग विभाग में इलाज करवाते रहते हैं, जबकि यह बीमारी कान से संबंधित है। कान में लेबरियंथ होता है जो कि शरीर का बैलेंस बनाने के लिए जिम्मेदार होता है। इसमें डैमेज होने की वजह से शरीर का बैलेंस नहीं होता है। उन्होंने बताया कि जल्द ही बेल्ट की तरह बंधी हवेस्टीबुलर असिस्टिव डिवाइस बाजार में आ जाएगी।

प्रो. हरमैन किंग्मा ने बताया कि खड़े होने, चलने, उठने बैठने के दौरान कान का एक हिस्सा (वेस्टीबुलर सिस्टम) शरीर का बैलेंस बनाए रखने का काम करता है। एक्सीडेंट में चोट लगने, इंफेक्शन होने या अन्य कारण से वेस्टीबुलर सिस्टम खराब होने पर बैलेंस की प्रॉब्लम आती है, इससे व्यक्ति को चक्कर आने, गिरने, चलते समय लड़ ाड़ाने, की समस्या होती है।

प्रो. किंग्मा ने एक और तकनीक के बारे में जानकारी दी जिसे कॉक्लियर इंप्लांट की तरह ही कान में इंप्लांट किया जा सकेगा, यह डिवाइस मरीज को बैलेंस रखने में मदद करेगी। एक बार छोटा चीरा लगाकर इसे कान में फिट कर दिया जाएगा, तो चक्कर आने और बैलेंस की दिक्कत हो जाएगी।

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