दुर्लभ बीमारी से पीड़ित 3 बच्चों के लिए प्रदेश सरकार से मदद की गुहार

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लखनऊ। छोटे से कस्बे इस्माईलपुर के निवासी पिता दिनेश कुमार की जिंदगी का हर दिन चुनौती से भरा है। उसके तीन छोटे-छोटे बच्चों का दुर्लभ आनुवांशिक विकार एमपीएस-1 बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी में शरीर के अंदर एक विशिष्ट प्रकार के इंजाइम का बनना बंद हो जाता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति की स्थिति धीरे-धीरे बेहद खराब होती जाती है और उसे अत्यंत दर्द का सामना करना पड़ता है। पीजीआई में चल रहे इलाज के लिए पिता दिनेश ने प्रदेश के मुख्यमंत्री से आर्थिक मदद इलाज के अनुसार करने की मांग की है। उसका कहना है कि वर्तमान में इलाज के लिए जो धनराशि मिल रही है, वह उसके बच्चों के इलाज के लिए बहुत कम है आैर उसकी आर्थिक हालत ऐसी नहीं है, जिससे उसके बच्चों का इलाज हो सके।

दिनेश ने बताया कि उसके तीन बच्चे रंजना (12), कल्पना (9) और विवेक (6) एक दुर्लभ आनुवांशिक विकार एमपीएस-1 से पीड़ित हैं। यह एक ऐसा रोग है, जिसमें इंसान का शरीर में एक विशिष्ट प्रकार के इंजाइम का बनना बंद हो जाता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति की स्थिति धीरे-धीरे बेहद खराब होने के साथ ही अत्यंत दर्द का सामना करना पड़ता है। उसके बताया कि वह पेशे से एक दर्ज़ी हैं, पिछले कई सालों से इस जद्दोजहद में लगे हुये हैं कि उनके तीनों बच्चों को उचित उपचार मिल सके और वह एक सामान्य जीवन जी सकें।

उसने बताया कि उसकी पहली बेटी रंजना को हड्डी एवं जोड़ से संबंधित कुछ परेशानी होना आरंभ हुई। उसने अपनी बेटी को कई डॉक्टरों को दिखाया। इलाज भी 5-6 सालों तक चला, परन्तु उसकी इस हालत का असली कारण पता नहीं चल पाया। इसी दौरान, उनके तीन और बच्चे हुये, जिनमें से दो में रंजना के जैसे ही लक्षण दिखने लगे, तो संजय गांधी पोस्ट ग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआइ) भेजा गया और वहां डॉक्टरों ने बताया कि तीनों बच्चों को एमपीएस-1 नामक बीमारी है।

पीजीआई के डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि एमपीएस का इलाज एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरैपी (ईआरटी) से किया जा सकता है और यह मरीज की जिंदगी में सकारात्मक असर लाने में काफी असरदार साबित हुई है। बच्चों का इलाज कर रहे डॉ. कौशिक मंडल (मेडिकल जेनेटिसिस्ट, एसजीपीजीआइ) ने दावा है कि इस बीमारी के कारण मरीज अपने रोजमर्रा के सामान्य काम भी नहीं कर पाता है। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, मरीज की हालत और भी खराब होती जाती है क्योंकि इस बीमारी से पूरे शरीर को नुकसान पहुंचता है। उसके ज्वाइंट्स, हड्डियां, दिल और रेस्पिरेटरी सिस्टम प्रभावित होने लगते हैं। ईआरटी को यदि सही समय पर कराया जाये तो इसकी मदद से मरीज एक सामान्य जीवन जी सकता है। इसलिए, मरीज को समय पर उपचार दिलाना बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

दुर्भाग्यवश, दिनेश और उसका परिवार इतना सक्षम नहीं था कि वह अपने तीनों बच्चों के इलाज का खर्च खुद से उठा सके। यही कारण है कि उन्होंने एलएसडी के लिए एक पेशेंट ग्रुप लाइसोसोमल स्टोरेज डिस्ऑर्डर्स सोसायटी (एलएसडीएसएस) से संपर्क साधा, सोसायटी ने स्थानीय विधायक को एक पत्र भेजकर उनकी मदद की। इस पत्र में दिनेश के बच्चों के इलाज के लिए फंड्स मुहैया कराने का अनुरोध किया गया था। इसके बाद, यह पत्र आगे मुख्यमंत्री (सीएम) कार्यालय को भेज दिया गया।

अब मौजूदा सरकार में हमें बच्चों के उपचार के लिए एक लाख रूपये (हर बच्चे के लिए 5 लाख रूपये) आवंटित किये गये हैं। उसने बताया कि प्रदेश सरकार हमारी हालत को लेकर संवेदशील है हालांकि, दी गयी इस धनराशि से सिर्फ तीन हफ्ते तक ही इलाज कराया जा सकता है। उपचार के दो चक्रों के लिए मिली यह राहत अब खत्म होने वाली है और हमारे पास ईआरटी के सिर्फ एक और सप्ताह के लिए रकम बची है।

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