हृदय रोग को जड़ से मिटाता है आयुर्वेद ! कैसे !

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आयुर्वेद की मानें, तो अधेड़ उम में हृदय-रोगों का होना, किस्मत का खराब होना या ऊपरवाले की नाराजगी नहीं है। बल्कि हमारे अपने ही ‘कर्मों’ का फल है। अनुचित खान-पान, आरामतलब जिन्दगी, व्यायाम से नाता न रखना, विचार और व्यवहार संबंधी पाबन्दी आदि वे करण है जो हृदय-रोगों को पनपने का मौका देते है ।

दरअसल, ह्रदय को लेकर आयुर्वेद की धारणा आधुनिक मान्यता के विपरीत है। आयुर्वेद हृदय को शरीर के अन्य अंगों को रक्त क्री आपूर्ति करने वाला महज एक महत्वपूर्ण अंग नहीं मानता। वह इसे आध्यत्मिक-आत्मिक महत्व का अंग भी मानता है। चरक के अनुसार, ‘हृदय आत्मचेतना का केन्द्र है । ‘ मानव शरीर के जो महत्वपूर्ण घटक हैं, उनमें दो हाथ, दो पैर, धड़-गरदन और सिर, पांच ज्ञानेन्द्रियों, मस्तिष्क, बुद्धिमत्ता और आत्मा का समावेश है। उक्त सभी घटक हदय की सामान्य कामकाजी प्रक्रिया पर निर्भर करते हैं। हदय के अस्वस्थ होने पर इन घटकों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, तो इन घटकों में से किसी एक या अधिक के अस्वस्थ होने पर हदय के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। ऐसे में हदय को स्वस्थ रखने के लिए व सम्पूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आचार-विचार, आहार, व्यायाम और योग-क्रियाओं को अति महत्वपूर्ण माना गया है। इन सबके बावजूद यदि हृदय विकारग्रस्त हो जाता है, तो उसके इलाज के लिए उचित आहार व इलाज को जानने से पहले ‘चरकसंहिता’ में जिक्र किए गए हदय-रोग के लक्षणों को जान लेना ज़रूरीहै।

ह्रदय रोग के लक्षण –

‘चरक’ के अनुसार, हृदय रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित है –

  • त्वचा का तेजहीन या असामान्य दिखाई देना
  • बेहोशी
  • हृदय में प्रदाह ( इन्फ्लैमेशन ) के चलते बुखार आना
  • खांसी
  • हृदय-कपाट में अवरोध के चलते हिचकी आना
  • सांस फूंलना
  • मुंह का स्वाद बिगड़ा रहना
  • भूख न लगना
  • प्यास अधिक लगना
  • छाती में दर्द
  • आँखों के सामने अंधेरा छा जाना. आदि

उचित आहार –

इस लेख में कुछ टिप्स दिए जा रहे हैं। इन पर अमल करके और उचित इलाज से हृदय-रोग की गंभीरता को कम कर सकते है या उससे पूरी तरह निजात पा सकते हैं …

  1. औसतन इतनी मात्रा में प्रोटीन की अधिकता वाले खाद्यपदार्थों का सेवन करें, जिससे रोजाना कम से कम 50 से 60 ग्राम की मात्रा में शरीर को प्रोटीन की आपूर्ति हो सके।
  2. हदय- धमनियों में अवरोध का कारण कोलेस्टेरॉल वाले खाद्य पदार्थों के अधिक सेवन का दुष्परिणाम है । लगभग सभी प्रकार के चर्बीदार खाद्य पदार्थों मसलन, पोर्क, बीफ, मांस, घी, बटर आदि का सेवन न करें।
  3. कोलेस्ट्रॉल व ट्राइग्लिसराइड्स के संश्लेषण में कार्बोहाइड्रेट्स की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए इनका सेवन भी कम मात्रा में करें।
  4. निकोटीन एसिड, रक्त में चर्बी की मात्रा को कम करता है, इसलिए इसकी अधिकता-वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन करें।
  5. वहुत कम मात्रा में, रोजाना अधिकतम 2 से 3 ग्राम की मात्रा में नमक का सेवन करें।
  6. रेशेदार खाद्य पदार्थों का अधिक मात्रा में
    सेवन करें ।
  7. लहसुन व सोंठ को नियमित प्रयोग में लाएं। लहसुन रक्त के कोलेस्ट्रॉल में कमी लाता है, तो सोंठ रक्त में थक्का बनने की प्रक्रिया में रोक लगाने में सहायक है ।

इलाज –

आयुर्वेद के अनुसार, हदयरोगों के इलाज व उनसे बचाव हेतु अर्जुन के पेड़ की छाल से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। अर्जुन की छाल को पाउडर में या फिर काढ़े के रूप में दिल के दौरे के दौरान व बाद में सेवन से हृदय की दशा में उल्लेखनीय सुधार होता है। इसके पाउडर को रोजाना चार बार एक-एक ग्राम की मात्रा में मरीज को दे। अनुभवी चिकित्सक के परामर्श पर घी, दूध, शहद या पिप्पली पाउडर के साथ मिलाकर इसका सेवन करने से विशेष लाभ होता है।
काढ़े के रूप में अर्जुन की छाल का सेवन करने के लिए इसके लगभग 30 प्राम पाउडर को आधा लिटर पानी में तब तक उबालें, जब तक कि पानी की मात्रा घटकर एक चौथाई न हो जाए। फिर इस काढे को घी या शहद के साथ मिलाकर सेवन करें। घी के साथ यदि काढे का सेवन करना है तो इसे गुनगुना गर्म रहने दें। शहद के साथ सेवन करने से पूर्व काढे को ठंडा कर लेना जरूरी होता है । अर्जुन छाल पाउडर को गाय के घी के साथ उबालकर रोजाना दो बार एक-एक चाय चम्मच की मात्रा में लेने से विशेष लाभ होता है। यदि मरीज मोठापाग्रस्त है, तो घी के साथ अर्जुन छाल का सेवन न करें।

वैसे इन दिनों अर्जुन छाल, अर्जुनारिष्ट, अर्जुनाघृत व अर्जुन कैप्सूल के रूप में उपलब्ध है। हृदयरोग की दशा में चिकित्सक
रोजाना दो बार 6 चाय-चम्मच की मात्रा में अर्जुनारिष्ट को उतनी ही मात्रा में पानी के साथ लेने की सलाह देते हैँ। हृदयरोग की दशा को ध्यान में रखकर ह्रदयन्र्व रस या/और प्रभाकर वटी की दो-दो गोलियां दिन में तीन से चार बार लेने से लाभ होता है ।

दिल का दौरा गंभीर हो तो मृगमदासव एक आदर्श औषधि साबित हो सकती है। दिल का दौरा पड़ने पर व उसके बाद में आधा से एक चम्मच की मात्रा में इस आसव को संभाग पानी के साथ सेवन करने से तत्काल लाभ होता है। अपने डॉक्टर के परामर्श से स्वर्णमलिनी वसंत, एक-एक गोली दिन में दो बार, मृगश्रृंग भस्म 125 मि. ग्रा. और बचे पाउडर 250 मि.ग्रा. भी दिन में दोनों वक्त खाने के बाद लें। अबाना (हिमालय) की दो-दो गोली दिन में दो बार सेवन करें।

ब्राह्मी, जटामांसी, गुडूची, पुनर्नवा, यष्टिमधु आदि आयुर्वेदिक औषधियों को भी हृदय हितकारी पाया गया है । डॉक्टरी सलाह पर इनमें से कुछ का चयन कर, इनका नियमित सेवन करें।
इनसे न सिर्फ हृदयरोगों की दशा में लाभ होता है, बल्कि हृदयरोगों से बचाव भी संभव है। चिकित्सक की देखरेख में हृदय बस्ति करना भी लाभ पहुंचता है।

जीवनशैली –

लगातार भारी शारीरिक श्रम, कब्जनाशक दवाओं का अधिक सेवन, भय, आतंक, घबराहट, विचारों पर नियंत्रण न होना, उलटी-वमन इत्यादि क्रियाओं को दबाना; अति कामुकता-आयुर्वेद के अनुसार, वे प्रमुख कारण है, जो हदय रोगों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए इन पर नियंत्रण जरूरी है। हृदयरोगियों के लिए रोजाना दो से तीन किमी. पैदल चलना लाभकारी पाया गया है। हदय-स्वास्थ्य की दृष्टि से शवासन का विशेष महत्व है, लिहाजा इसे अपनी रोजमर्रा की जीवनशैली में जगह दें।


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